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मेहंदी

शुरूआत में ज़मीं के कलेजे को चीरा गया उसके बाद एक छोटा सा पौधा, जिसमें गिनी-चुनी शाखें और बस कुछ पत्तियाँ मौज़ूद थीं, ज़मीं के बदन पर लगाया गया। इसके बाद ढेर सारी मेहनत और आब-ओ-खाद के दम पर वो पौधा बड़ा हुआ। धीरे-धीरे उसमें से कई शाख़ें निकली उन शाख़ो ने अनगिनत नयी पत्तियों को जन्म दिया और उन पत्तियों को धीरे-धीरे ज़वां किया। एक सुबह मेहंदी की उन पत्तियों को शाख़ों से जुदा करके बेजान बना दिया गया फिर उन पत्तियों को लगातार धोया गया ज़ब तक कि उनकी बची-खुची साँसें भी रूक न गयी इसके बाद उन बेजान पत्तियों के बदन को दो पत्थरों के बीच रखकर बार-बार कुचला गया ज़ब तक कि उनका वजूद ख़त्म नहीं हो गया तब कहीं जाकर वो इस क़ाबिल बनी कि उनके पैरों को छू सके। बस उनके पैरों को छूने के लिए मेहंदी ने कितनी तकलीफ़ उठायी होगी इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ज़रा सोचिए सिर्फ़ पैरों तक पहुँचने के लिए मेहंदी ने इतनी दुश्वारियाँ झेली तो उनके दिल तक पहुँचने के लिए कितनी मुश्किलों से होकर गुज़रना होगा।
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मज़हबी एकता की बात करने वाले इक़बाल ने कैसे बनाया पाकिस्तान?

इंसान की फ़ितरत, उसकी विचारधारा, उसकी सोच और उसके सोचने का नज़रिया आदि वक़्त के साथ बदलते रहता है। कोई भी इंसान हमेशा अच्छा या हमेशा बुरा नहीं हो सकता वक़्त का पहिया हमेशा चलता रहता है और इंसान का स्वभाव हमेशा बदलता रहता है। उर्दू के सबसे मशहूर शायरों में से एक और पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि मुहम्मद इक़बाल अपनी ज़िन्दगी के शुरूआती दिनों में कट्टर देशभक्त हुआ करते थे। उन्होंने भगवान राम को इमाम-ए-हिन्द कहा और 1904 में तराना-ए-हिन्दी की रचना की जिसे सुनकर आज भी हम हिन्दुस्तानियों के लहू में देशभक्ति की लहरें दौड़ने लगती हैं। इक़बाल ने लिखा- "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्ताँ हमारा मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहाँ से अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशाँ हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा" मुहम्मद इक़बाल के दादा कश्मीरी पंडित थे इक़बाल का जन्म ग़ुलाम भारत के पंजाब में हुआ था। उन्हें अल्लामा इक़बाल, इक़बाल-ए-लाहौर, शा...

मेला

दशहरा मतलब मेला, मेला मतलब ढेरों ख़ुशियाँ, खिलौने, गुब्बारे, चाट, समोसा वगैरह-वगैरह। जी हाँ, बचपन में दशहरा का मतलब यही होता था पूरे साल बड़ी बेकसी और बेसब्री से किसी चीज़ का इंतज़ार किया जाता था तो वह मेला था। अनन्त चतुर्दशी जहाँ बीतती कि सब्र का बाँध टूटने लगता बार-बार माँ से पूछा जाता कि मेला कब है, मेला कब है और फिर हमारी मेले की तय्यारियाँ शुरू हो जाती थीं। पहले तो साल भर तक बड़ी शिद्दत से बचाये हुए एक-एक पैसे का हिसाब शुरू होता, गुल्लक बड़ी बेरहमी से तोड़ दिये जाते और घर के सभी लोगों से मेले का मोल-तोल शुरू हो जाता खासकर माँ से कि आप कितना देंगी, पिछली साल भी तो इतना ही दिया था, इतने में तो कुछ नहीं हो पाएगा ऐसी बातें बोल-बोलकर माँ को अहसास दिलाया जाता कि आप मेले के लिए बहुत कम पैसे दे रही हैं। माँ के बाद पापा, पिताजी(बड़े पापा), मम्मीजी(बड़ी मम्मी), चाचा और चाची सब लोग कुछ न कुछ देते थे जिससे काम भर पैसों का बंदोबस्त तो हो ही जाता था। इस तय्यारी के हो जाने के बाद एक बड़ा सवाल यह आता था कि मेला किसके साथ जाना है। मेरे भाई साहब, यूँ तो हर साल मेला ले कर वही जाते थे लेकिन मान-मनव्...

इतवार

बहुत इंतजार के बाद हफ़्ते के आख़िरी दिन इतवार आता है। इस दिन के लिए खूब इंतजार होता है, ढेरों काम इस दिन के लिए सोच कर मैंने रखा होता है, पूरे हफ़्ते की पढ़ी हुई चीज़ों को दुहरा लेना है, यार-दोस्तों से खूब बातें करनी है, शाम को कहीं घूमने निकल जाना है, कोई नयी कहानी लिख डालनी है, सलीके से कुछ अच्छा बनाकर उसे बड़ी मुहब्बत से खाना है और खूब सोना है। 24 घंटे का इतवार आता है और कैसे निकल जाता है बिल्कुल पता ही नहीं चलता और जब शाम होने को आती है और सोचे गये कामों में से एक भी काम पूरा नहीं हो पाता तो ख़याल आता है चलो इस इतवार को ना सही, अगले इतवार को सारे शौक पूरे कर लूँगा और फिर अगले इतवार को भी यही होता है। हम सब अपनी ज़िन्दगी में बहुत मशरूफ़ हो गये हैं इतने मशरूफ़ कि हमारे पास हमारे लिए ही वक़्त नहीं है। हमारे दिलों के दायरे छोटे होते जा रहे हैं और चाहतों की दीवारें आसमान से भी ऊँची होती जा रही है। अब ख़्वाहिशें पूरी करनी हैं तो कुर्बानी तो देनी ही होगी और किस-किस चीज़ की कुर्बानी देनी होगी, इसका हमें अंदाजा भी नहीं है।      style="display:block"     ...

विद्यार्थी

कहते हैं विद्यार्थी जीवन बेहद खूबसूरत होता है इस बात से तो कतई इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत लम्हों का लुत्फ़ उठाने के लिए आपको विद्यार्थी बनना ही पड़ेगा लेकिन सच यह भी है कि एक विद्यार्थी को इस दौर से गुज़रते वक़्त ढेरों तकलीफ़ों और संघर्षों से दो-चार होना पड़ता है और फिर इन्हीं संघर्षों की बदौलत आप आगे चलकर कामयाबी की एक नयी इबारत लिख पाते हैं। मैं आपको ज्यादा दूर न ले जाते हुए अपने ही हालात से रूबरू कराता हूँ क्योंकि अगर एक बार मैं आपको दूर लेकर चला गया तो मैं और आप दोनों रास्ता भटक सकते हैं क्योंकि मेरी याददाश्त जरा कमजोर है और मैं लापरवाह भी खूब हूँ इसलिए मैं आपको ले जा सकता हूँ लेकिन वापस लाने की जिम्मेदारी नहीं ले सकता। सुबह 5 बजे से मेरी ज़िन्दगी शुरू होती है और रात 12 बजे ख़त्म होती है इसके बीच दिन में मैं कभी नहीं सोता वैसे ईमान से कहूँ तो कभी-कभी सो भी जाया करता हूँ लेकिन ऐसा तब होता है जब मैं खुद से बगावत कर देता हूँ। सुबह 6 बजे मुझे घर से निकल जाना होता है और फिर दोपहर 1 बजे तक घर पर वापसी होती है घर आते-आते भूख से बुरा हाल हो जाता है और आलम य...

वो शख़्स जो मेरा क़त्ल करने वाला था

वो शख़्स जो मिरा क़त्ल करने वाला था मैंने अपनी ज़िन्दगी उसके नाम कर दी। मैं जानता था अंजाम अपनी आशिकी का फिर भी जालिम पे रूह कुर्बान कर दी। अभी तक तो सिर्फ सुना ही था इश्क़ को मजा आया जब रातों की नींद हराम कर दी। रस्ते में कोई पूछ न बैठे हालचाल मिरा ये सोचकर ही घर जाने में शाम कर दी। अब तो ये भी होश नहीं है कि होश में हूँ जबसे शेर-ओ-शायरी की दुकान कर दी।

मेरे पापा मेरे हीरो

बचपन से ही सुनता आ रहा हूँ कि मेरी ज्यादातर आदतें पापा पर गयी हैं कम बोलना, गंभीर रहना, सहनशीलता, सरल और संकोची स्वभाव ये सब मुझे पापा से विरासत में मिला है। मेरी नजरों में तो अब मैं बड़ा हो चुका हूँ लेकिन पापा की नजरों में आज भी बच्चा ही हूँ। आज भी घर से निकलूं और समय पर घर ना पहुँचू तो सबसे ज्यादा चिन्ता पापा को ही होती है। बार-बार खिड़की से झांककर सड़क की तरफ देखना और जब मैं ना दिखूं तो बार-बार फोन करना, शायद पापा को पता ही नहीं कि उनका बेटा अपनी एक चौथाई उम्र जी चुका है, शायद उनकी नजर में मैं वही हूँ जो बचपन में हुआ करता था। मेरा मानना है कि साहित्यकारों ने पिता को हमेशा से उपेक्षित रखा है। हिंदी और उर्दू के महान लेखकों, कवियों व शायरों ने माँ को तो वो स्थान तो दिया जिसकी वो हकदार थीं लेकिन पिता को उनका हक देने में वो असफल रहे। माँ के लिए लिखने वाले, माँ के लिए कहने वाले तो मुनव्वर राना जैसे सैकड़ो हैं लेकिन पिता के लिए लिखने वाला, पिता के लिए कहने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। आखिर पिता के साथ ये भेदभाव क्यों, ये कठोरता क्यों, ये निर्ममता क्यों? पिता वो है जो अपने बेटे के ...