बचपन से ही सुनता आ रहा हूँ कि मेरी ज्यादातर आदतें पापा पर गयी हैं कम बोलना, गंभीर रहना, सहनशीलता, सरल और संकोची स्वभाव ये सब मुझे पापा से विरासत में मिला है। मेरी नजरों में तो अब मैं बड़ा हो चुका हूँ लेकिन पापा की नजरों में आज भी बच्चा ही हूँ। आज भी घर से निकलूं और समय पर घर ना पहुँचू तो सबसे ज्यादा चिन्ता पापा को ही होती है। बार-बार खिड़की से झांककर सड़क की तरफ देखना और जब मैं ना दिखूं तो बार-बार फोन करना, शायद पापा को पता ही नहीं कि उनका बेटा अपनी एक चौथाई उम्र जी चुका है, शायद उनकी नजर में मैं वही हूँ जो बचपन में हुआ करता था।
मेरा मानना है कि साहित्यकारों ने पिता को हमेशा से उपेक्षित रखा है। हिंदी और उर्दू के महान लेखकों, कवियों व शायरों ने माँ को तो वो स्थान तो दिया जिसकी वो हकदार थीं लेकिन पिता को उनका हक देने में वो असफल रहे। माँ के लिए लिखने वाले, माँ के लिए कहने वाले तो मुनव्वर राना जैसे सैकड़ो हैं लेकिन पिता के लिए लिखने वाला, पिता के लिए कहने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। आखिर पिता के साथ ये भेदभाव क्यों, ये कठोरता क्यों, ये निर्ममता क्यों? पिता वो है जो अपने बेटे के लिए अपनी जिंदगी, अपनी ख़्वाहिशें, अपने सपने कुर्बान कर सकता है और यकीनन करता भी है।
मेरे पापा ने बचपन से लेकर आज तक मेरी हर एक इच्छा पूरी की उन्होंने मुझे वो भी दिया जो वो नहीं दे सकते थे। बचपन में मैं उन्हें ठीक से समझ नहीं पाता था वो बहुत रूखे हुआ करते थे माँ कहती भी थीं कि इन्हें अपना प्यार जताने नहीं आता लेकिन जबसे मैं उनसे दूर हो गया उन्होंने ये हुनर भी सीख लिया। वो पापा जिनको मैं बेहद कठोर समझा करता था अचानक से बहुत नरमदिल हो गये। अब वो फोन पर खुल कर बातें करते हैं, खुद भी हंसते हैं और मुझे भी हंसाते हैं, सामने बैठ कर घंटों तक मुझसे भारतीय राजनीति पर चर्चा करते रहते हैं और मैं भी कुरेद-कुरेद कर ज्ञान के वो मोती उनसे लेने का प्रयास करता हूँ जो मुझे कहीं और नहीं मिल सकते। पापा सभी विषयों के जानकार हैं खासकर राजनीतिशास्त्र पर आज भी उनकी गजब की पकड़ है कॉलेज के दिनों में वो कई जिला-स्तरीय और प्रदेश-स्तरीय वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे और उनमें अव्वल आते थे उनके सहपाठी बताते हैं कि उनके सभी विषय उस समय उन्हें कंठस्थ हुआ करते थे। कभी-कभी जब उन्हें मुझे हराने का मन करता है तो राजनीतिशास्त्र के वो ऐसे ऐसे गोले दागते हैं जिनसे मैं बच नहीं पाता उन्हें वो सबकुछ आज भी याद है जो उन्होंने कई दशक पहले पढ़ा था।
पापा उस मुकाम तक नहीं पहुँच सके जहाँ उन्हें होना चाहिए था इसलिए अब वो मुझमें खुद को देखते हैं। वो चाहते हैं कि उनका बेटा वो करे जिसका सपना उन्होंने कभी देखा था अब उनके सारे अधूरे सपने पूरा करना मेरी जिम्मेदारी है। पापा, आप यकीन रखिए आपका बेटा वो सपने जरूर पूरा करेगा जो आप अक्सर देखते हैं। यकीन रखिए एक दिन आपको अपने इस बेटे पर बहुत फक्र होगा।

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