दशहरा मतलब मेला, मेला मतलब ढेरों ख़ुशियाँ, खिलौने, गुब्बारे, चाट, समोसा वगैरह-वगैरह। जी हाँ, बचपन में दशहरा का मतलब यही होता था पूरे साल बड़ी बेकसी और बेसब्री से किसी चीज़ का इंतज़ार किया जाता था तो वह मेला था। अनन्त चतुर्दशी जहाँ बीतती कि सब्र का बाँध टूटने लगता बार-बार माँ से पूछा जाता कि मेला कब है, मेला कब है और फिर हमारी मेले की तय्यारियाँ शुरू हो जाती थीं। पहले तो साल भर तक बड़ी शिद्दत से बचाये हुए एक-एक पैसे का हिसाब शुरू होता, गुल्लक बड़ी बेरहमी से तोड़ दिये जाते और घर के सभी लोगों से मेले का मोल-तोल शुरू हो जाता खासकर माँ से कि आप कितना देंगी, पिछली साल भी तो इतना ही दिया था, इतने में तो कुछ नहीं हो पाएगा ऐसी बातें बोल-बोलकर माँ को अहसास दिलाया जाता कि आप मेले के लिए बहुत कम पैसे दे रही हैं। माँ के बाद पापा, पिताजी(बड़े पापा), मम्मीजी(बड़ी मम्मी), चाचा और चाची सब लोग कुछ न कुछ देते थे जिससे काम भर पैसों का बंदोबस्त तो हो ही जाता था। इस तय्यारी के हो जाने के बाद एक बड़ा सवाल यह आता था कि मेला किसके साथ जाना है। मेरे भाई साहब, यूँ तो हर साल मेला ले कर वही जाते थे लेकिन मान-मनव्वल बहुत ज़्यादा करनी पड़ती थी कई बार तो वो साफ़ मना कर दिया करते थे और कई बार मैं रो भी पड़ता था लेकिन बावजूद इसके मेला कभी नहीं छूटता ऐन वक़्त पर मेले की शाम को भईया आते और कहते कि जल्दी से कपड़े पहनकर चलो और आख़िर मेले से रूबरू होने का मौका मिल ही जाता था। उसके बाद कई दिन तक मेले को याद करने, खिलौनों से खेलने, उन्हें तोड़ने का दौर चलता और फिर थक जाने पर अगले मेले का इंतज़ार शुरू हो जाता लेकिन हर बार कुछ न कुछ अफ़सोस रह ही जाता कि फ़लाँ चीज़ नहीं खायी, फ़लाँ चीज़ नहीं खरीदी और फ़लाँ चीज़ तो भूल ही गयी और फिर ये सोचकर-सोचकर खुद को तसल्ली दी जाती कि अगले मेले में ये शौक़ पूरे कर लिए जाएँगे।
फिर एक रोज़ अचानक बचपन हाथों से निकल गया और इन सबका सिलसिला भी अचानक से ख़त्म हो गया। बचपन चला गया और शायद मैं जवाँ हो गया गाँव छूट गया, घर छूट गया, परिवार छूट गया, माँ, पापा, भईया घर का कोई भी आदमी अब पास नहीं रहा और इन सबके साथ छूट गया मेला वही मेला जिसका इंतज़ार मैं पूरे बरस तक करता था। अब माँ से पूछना नहीं पड़ता कि मेला कब है क्योंकि मुझे खुद पता है कि मेला कब है लेकिन ये अलग बात है कि मेले को लेकर अब दिल में कोई ख़ुशी नहीं पनप पाती कभी-कभी मेले के दिन भी सूरज निकलने तक सोता रहता हूँ और मेले की शाम भी बाकी शामों की तरह गुज़ार देता हूँ। क्यों? क्योंकि शायद मैं ज़वाँ हो चुका हूँ। अब न वो मेला आता है, न गुल्लक टूटते हैं, न भईया मुझे चिढ़ाते हैं, न घर के लोग पैसा देते हैं, न मेला देखने जा पाता हूँ और न ही अगले बरस के मेले का इंतज़ार करता हूँ क्योंकि मैं अब जवाँ हो चुका हूँ। खैर, शहर में तो रोज़ मेला है और दशहरे के लिए खास मेला यहाँ भी लगता है लेकिन शहर की हवाओं में गाँव जैसी तरो-ताज़गी नहीं, शहर के लोगों में गाँव के लोगों जैसी मासूमियत और सीधापन नहीं, शहर के मेलों की चाट में गाँव के चाट का जायका नहीं मिलता, शहर के समोसों में शेरपुर और सेमरा के समोसो जैसी लज़्ज़त नहीं मिलती। अगर कभी भूल से शहर के मेलों में चला भी जाता हूँ तो घुटन सी होती है क्योंकि यहाँ मेरी माँ नहीं है, यहाँ मेरा गाँव नहीं है, यहाँ मेरा मेला नहीं है और यहाँ मेरा सुकून भी नहीं है। जवानी जिसे कहते हैं उसने मुझसे मेरी बहुत सारी ख़ूबसूरत और बेशक़ीमती चीज़ें छीन ली उन्हीं में से एक मेला भी है। देखते हैं हमारी जवानी हमें अभी क्या-क्या गुल खिलाती है।
फिर एक रोज़ अचानक बचपन हाथों से निकल गया और इन सबका सिलसिला भी अचानक से ख़त्म हो गया। बचपन चला गया और शायद मैं जवाँ हो गया गाँव छूट गया, घर छूट गया, परिवार छूट गया, माँ, पापा, भईया घर का कोई भी आदमी अब पास नहीं रहा और इन सबके साथ छूट गया मेला वही मेला जिसका इंतज़ार मैं पूरे बरस तक करता था। अब माँ से पूछना नहीं पड़ता कि मेला कब है क्योंकि मुझे खुद पता है कि मेला कब है लेकिन ये अलग बात है कि मेले को लेकर अब दिल में कोई ख़ुशी नहीं पनप पाती कभी-कभी मेले के दिन भी सूरज निकलने तक सोता रहता हूँ और मेले की शाम भी बाकी शामों की तरह गुज़ार देता हूँ। क्यों? क्योंकि शायद मैं ज़वाँ हो चुका हूँ। अब न वो मेला आता है, न गुल्लक टूटते हैं, न भईया मुझे चिढ़ाते हैं, न घर के लोग पैसा देते हैं, न मेला देखने जा पाता हूँ और न ही अगले बरस के मेले का इंतज़ार करता हूँ क्योंकि मैं अब जवाँ हो चुका हूँ। खैर, शहर में तो रोज़ मेला है और दशहरे के लिए खास मेला यहाँ भी लगता है लेकिन शहर की हवाओं में गाँव जैसी तरो-ताज़गी नहीं, शहर के लोगों में गाँव के लोगों जैसी मासूमियत और सीधापन नहीं, शहर के मेलों की चाट में गाँव के चाट का जायका नहीं मिलता, शहर के समोसों में शेरपुर और सेमरा के समोसो जैसी लज़्ज़त नहीं मिलती। अगर कभी भूल से शहर के मेलों में चला भी जाता हूँ तो घुटन सी होती है क्योंकि यहाँ मेरी माँ नहीं है, यहाँ मेरा गाँव नहीं है, यहाँ मेरा मेला नहीं है और यहाँ मेरा सुकून भी नहीं है। जवानी जिसे कहते हैं उसने मुझसे मेरी बहुत सारी ख़ूबसूरत और बेशक़ीमती चीज़ें छीन ली उन्हीं में से एक मेला भी है। देखते हैं हमारी जवानी हमें अभी क्या-क्या गुल खिलाती है।

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