बहुत इंतजार के बाद हफ़्ते के आख़िरी दिन इतवार आता है। इस दिन के लिए खूब इंतजार होता है, ढेरों काम इस दिन के लिए सोच कर मैंने रखा होता है, पूरे हफ़्ते की पढ़ी हुई चीज़ों को दुहरा लेना है, यार-दोस्तों से खूब बातें करनी है, शाम को कहीं घूमने निकल जाना है, कोई नयी कहानी लिख डालनी है, सलीके से कुछ अच्छा बनाकर उसे बड़ी मुहब्बत से खाना है और खूब सोना है। 24 घंटे का इतवार आता है और कैसे निकल जाता है बिल्कुल पता ही नहीं चलता और जब शाम होने को आती है और सोचे गये कामों में से एक भी काम पूरा नहीं हो पाता तो ख़याल आता है चलो इस इतवार को ना सही, अगले इतवार को सारे शौक पूरे कर लूँगा और फिर अगले इतवार को भी यही होता है।
हम सब अपनी ज़िन्दगी में बहुत मशरूफ़ हो गये हैं इतने मशरूफ़ कि हमारे पास हमारे लिए ही वक़्त नहीं है। हमारे दिलों के दायरे छोटे होते जा रहे हैं और चाहतों की दीवारें आसमान से भी ऊँची होती जा रही है। अब ख़्वाहिशें पूरी करनी हैं तो कुर्बानी तो देनी ही होगी और किस-किस चीज़ की कुर्बानी देनी होगी, इसका हमें अंदाजा भी नहीं है।
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