और जब रात के 3 बज रहे होते हैं, जब मैं अपने कमरे में बिल्कुल अकेला होता हूँ, जब किताबों से मन ऊब जाता है, जब गली में और गली के हर घर में सन्नाटा होता है, जब सारे श़हर के साथ तुम भी गहरी नींद में सो रही होती हो और जब मुझे बिल्कुल भी नींद नहीं आती तब अनायास ही तुम्हारी याद आती है और दिल बेचैन सा हो जाता है। चेहरे पर झूठी हँसी के साथ और चंद लोगों के साथ तो सारा दिन गुजार देता हूँ लेकिन शाम के बाद रात आते-आते तुम और तुम्हारी याद मुझ पर भारी पड़ जाती हैं और मैं रोज टूट जाता हूँ, रोज हार जाता हूँ। style="display:block" data-ad-client="ca-pub-2116046723162282" data-ad-slot="4630477015" data-ad-format="auto"> सच कहूँ तो अब आदत पड़ चुकी है। ज्यादा तड़प, ज्यादा दर्द अब नहीं होता लेकिन कभी कभी बेचैनी ज्यादा बढ़ जाती है तो तुमसे बात करने का, तुम्हें देखने का मन करता है और सच कहूँ तो बहुत मन करता है कभी कभी सोचता हूँ कि तुम्हें देख लूँ, तुमसे मिल लूँ, तुमसे बात कर लूँ लेकिन किस रिश्ते से, किस हक़ से ये भी न...
लिखना जुनून है। अंग्रेजी नहीं आती। घोर सामाजिक। पुरानी चीजों का शौक़ीन। अपने लफ़्ज़ों से अपनी पहचान बनाने की कोशिश।