शुरूआत में ज़मीं के कलेजे को चीरा गया उसके बाद एक छोटा सा पौधा, जिसमें गिनी-चुनी शाखें और बस कुछ पत्तियाँ मौज़ूद थीं, ज़मीं के बदन पर लगाया गया। इसके बाद ढेर सारी मेहनत और आब-ओ-खाद के दम पर वो पौधा बड़ा हुआ। धीरे-धीरे उसमें से कई शाख़ें निकली उन शाख़ो ने अनगिनत नयी पत्तियों को जन्म दिया और उन पत्तियों को धीरे-धीरे ज़वां किया।
एक सुबह मेहंदी की उन पत्तियों को शाख़ों से जुदा करके बेजान बना दिया गया फिर उन पत्तियों को लगातार धोया गया ज़ब तक कि उनकी बची-खुची साँसें भी रूक न गयी इसके बाद उन बेजान पत्तियों के बदन को दो पत्थरों के बीच रखकर बार-बार कुचला गया ज़ब तक कि उनका वजूद ख़त्म नहीं हो गया तब कहीं जाकर वो इस क़ाबिल बनी कि उनके पैरों को छू सके। बस उनके पैरों को छूने के लिए मेहंदी ने कितनी तकलीफ़ उठायी होगी इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ज़रा सोचिए सिर्फ़ पैरों तक पहुँचने के लिए मेहंदी ने इतनी दुश्वारियाँ झेली तो उनके दिल तक पहुँचने के लिए कितनी मुश्किलों से होकर गुज़रना होगा।
एक सुबह मेहंदी की उन पत्तियों को शाख़ों से जुदा करके बेजान बना दिया गया फिर उन पत्तियों को लगातार धोया गया ज़ब तक कि उनकी बची-खुची साँसें भी रूक न गयी इसके बाद उन बेजान पत्तियों के बदन को दो पत्थरों के बीच रखकर बार-बार कुचला गया ज़ब तक कि उनका वजूद ख़त्म नहीं हो गया तब कहीं जाकर वो इस क़ाबिल बनी कि उनके पैरों को छू सके। बस उनके पैरों को छूने के लिए मेहंदी ने कितनी तकलीफ़ उठायी होगी इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ज़रा सोचिए सिर्फ़ पैरों तक पहुँचने के लिए मेहंदी ने इतनी दुश्वारियाँ झेली तो उनके दिल तक पहुँचने के लिए कितनी मुश्किलों से होकर गुज़रना होगा।

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