अक्सर रातों को मुझे नींद नहीं आती, अक्सर यूँ ही मैं गुमसुम हो जाता हूँ, अक्सर बैठे-बैठे अचानक किसी के खयालों में खो जाता हूँ, अक्सर अकेले में फूट-फूटकर रो पड़ता हूँ, अक्सर गंगा-यमुना के किनारों पर बैठकर उसकी लहरों को खुद के अंदर महसूस करता हूँ क्योंकि ठीक वैसी ही लहरें मेरे अंदर भी शोर मचा रही हैं, अक्सर ये दुनिया वीरान सी लगती है, अक्सर मैं व्यथित हो जाता हूँ कभी खुद को देखकर, कभी गंगा के गोद में बसे मेरे उस छोटे से गाँव को देखकर तो कभी उस शहर को देखकर, जिसमें फुटपाथ पर सोये लोगों को रात के अंधेरों में गाड़ियों से कुचल दिया जाता है और फिर अक्सर रातों को मुझे नींद नहीं आती! शायद जो मैं हूँ, वो मैं हूँ ही नहीं और शायद जो मैं हूँ वो कोई देख नहीं सकता, कोई समझ नहीं सकता क्योंकि शायद एक हद के बाद मैंने खुद के करीब किसी को आने ही नहीं दिया यहाँ तक कि खुद को भी नहीं क्योंकि मेरे दिल के दरवाजों पर एक बड़ा सा काला ताला लगा है और जिसकी चाबी शायद मैंने कहीं खो दी है उस चाबी को मैं रोज़ ढूंढता हूँ लेकिन वो मुझे कहीं नहीं मिलती क्योंकि शायद किसी शख़्स ने चुराकर उसे अपने पास रख लिया है और शायद व...
लिखना जुनून है। अंग्रेजी नहीं आती। घोर सामाजिक। पुरानी चीजों का शौक़ीन। अपने लफ़्ज़ों से अपनी पहचान बनाने की कोशिश।