इंसान की फ़ितरत, उसकी विचारधारा, उसकी सोच और उसके सोचने का नज़रिया आदि वक़्त के साथ बदलते रहता है। कोई भी इंसान हमेशा अच्छा या हमेशा बुरा नहीं हो सकता वक़्त का पहिया हमेशा चलता रहता है और इंसान का स्वभाव हमेशा बदलता रहता है। उर्दू के सबसे मशहूर शायरों में से एक और पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि मुहम्मद इक़बाल अपनी ज़िन्दगी के शुरूआती दिनों में कट्टर देशभक्त हुआ करते थे। उन्होंने भगवान राम को इमाम-ए-हिन्द कहा और 1904 में तराना-ए-हिन्दी की रचना की जिसे सुनकर आज भी हम हिन्दुस्तानियों के लहू में देशभक्ति की लहरें दौड़ने लगती हैं। इक़बाल ने लिखा-
"सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्ताँ हमारा
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशाँ हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा"
मुहम्मद इक़बाल के दादा कश्मीरी पंडित थे इक़बाल का जन्म ग़ुलाम भारत के पंजाब में हुआ था। उन्हें अल्लामा इक़बाल, इक़बाल-ए-लाहौर, शायर-ए-मशरीक़, मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान आदि नामों से जाना जाता है। राष्ट्र, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक एकता की बातें करने वाले क्रांतिकारी शायर इक़बाल का नज़रिया उस वक़्त तक पूरा बदल गया जब वो इंग्लैंड से अपनी तालीम पूरी करके वापस लौटे। इसके बाद 1910 में इक़बाल ने तराना-ए-मिल्ली लिखी जिसे पढ़कर यकीन हो जाता है कि मज़हबी एकता की बातें करने वाला इक़बाल नाम का शायर अब मर चुका है-
"ऐ अर्ज़-ए-पाक तिरी हुर्मत पे कट मरे हम
है खूं तिरी रगों में अब तक रवां हमारा
चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्तां हमारा,
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा"
दरअसल ब्रितानिया हुक़ूमत हिन्दुस्तान में हिन्दू-मुसलमान को आपस में लड़ाना चाहती थी और इक़बाल उस हुक़ूमत का मोहरा बनकर रह गये। 1930 में इक़बाल ने ही सबसे पहले पाकिस्तान की माँग की और अपनी इस ज़िद में वो इतने जुनूनी हो गये कि मुहम्मद अली जिन्ना को आगे करके उन्होंने पाकिस्तान बना ही लिया। इक़बाल की ही तरह जिन्ना भी शुरूआत में राष्ट्रवाद की बातें किया करते थे लेकिन 1938 में अपनी मौत से पहले ही इक़बाल, जिन्ना की सोच को बदलने में कामयाब रहे और आख़िरकार इक़बाल की मौत के 9 सालों के बाद भारत की आज़ादी के साथ पाकिस्तान बना। एक महान क्रांतिकारी, महान विचारक और महान कवि इस हद तक सनकी हो गया कि उसने तक़सीम-ए-हिन्द करा दिया ये जानकर बहुत अफ़सोस होता है। 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी' लिखने वाले इक़बाल ने बाद में लिखा-
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में"
"सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्ताँ हमारा
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशाँ हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा"
मुहम्मद इक़बाल के दादा कश्मीरी पंडित थे इक़बाल का जन्म ग़ुलाम भारत के पंजाब में हुआ था। उन्हें अल्लामा इक़बाल, इक़बाल-ए-लाहौर, शायर-ए-मशरीक़, मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान आदि नामों से जाना जाता है। राष्ट्र, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक एकता की बातें करने वाले क्रांतिकारी शायर इक़बाल का नज़रिया उस वक़्त तक पूरा बदल गया जब वो इंग्लैंड से अपनी तालीम पूरी करके वापस लौटे। इसके बाद 1910 में इक़बाल ने तराना-ए-मिल्ली लिखी जिसे पढ़कर यकीन हो जाता है कि मज़हबी एकता की बातें करने वाला इक़बाल नाम का शायर अब मर चुका है-
"ऐ अर्ज़-ए-पाक तिरी हुर्मत पे कट मरे हम
है खूं तिरी रगों में अब तक रवां हमारा
चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्तां हमारा,
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा"
दरअसल ब्रितानिया हुक़ूमत हिन्दुस्तान में हिन्दू-मुसलमान को आपस में लड़ाना चाहती थी और इक़बाल उस हुक़ूमत का मोहरा बनकर रह गये। 1930 में इक़बाल ने ही सबसे पहले पाकिस्तान की माँग की और अपनी इस ज़िद में वो इतने जुनूनी हो गये कि मुहम्मद अली जिन्ना को आगे करके उन्होंने पाकिस्तान बना ही लिया। इक़बाल की ही तरह जिन्ना भी शुरूआत में राष्ट्रवाद की बातें किया करते थे लेकिन 1938 में अपनी मौत से पहले ही इक़बाल, जिन्ना की सोच को बदलने में कामयाब रहे और आख़िरकार इक़बाल की मौत के 9 सालों के बाद भारत की आज़ादी के साथ पाकिस्तान बना। एक महान क्रांतिकारी, महान विचारक और महान कवि इस हद तक सनकी हो गया कि उसने तक़सीम-ए-हिन्द करा दिया ये जानकर बहुत अफ़सोस होता है। 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी' लिखने वाले इक़बाल ने बाद में लिखा-
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में"

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