आजकल आधुनिकता की दौड़ में जवान बेटे अपने उन्हीं माँ-बाप को बेसहारा कर देते हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन अपने बेटों के उज्जवल भविष्य पर न्यौछावर कर दिया। यहाँ तक कि खुद भूखे रहकर अपने बच्चों को खिलाया, खुद अनपढ़ होते हुए भी अपने बच्चों को बड़े से बड़े स्कूल में पढ़ाया और खुद फटे-पुराने कपड़े पहनकर अपने बच्चों को मँहगे से मँहगा कपड़ा पहनाया और वही बच्चे जब अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं तो वो ये सोचना जरूरी नहीं समझते कि उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाने में किसने कितनी कुर्बानियाँ दी हैं। ऐसी ही हालत में पहुँच चुके एक बेसहारा पिता के मनोभावों को वर्णित करती चंद पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं। अंगुलियों को पकड़ कर जिसे चलना सिखाया, कई बार गिरने के बाद जिसे संभलना सिखाया। कंधे पे बैठा के जिसे दुनिया दिखाई, तूफानों में जान पर खेलकर जिसकी जान बचाई। मेरा वही बेटा मुझे बेसहारा कर गया, मेरी ख़ज़ां में मुझे पराया कर गया। बेटे ऐसे होते हैं ये अंदाजा न था, ऐसे होते हैं तो ऐ ख़ुदा मुझे बाप बनाना न था।
लिखना जुनून है। अंग्रेजी नहीं आती। घोर सामाजिक। पुरानी चीजों का शौक़ीन। अपने लफ़्ज़ों से अपनी पहचान बनाने की कोशिश।