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विद्यार्थी

कहते हैं विद्यार्थी जीवन बेहद खूबसूरत होता है इस बात से तो कतई इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत लम्हों का लुत्फ़ उठाने के लिए आपको विद्यार्थी बनना ही पड़ेगा लेकिन सच यह भी है कि एक विद्यार्थी को इस दौर से गुज़रते वक़्त ढेरों तकलीफ़ों और संघर्षों से दो-चार होना पड़ता है और फिर इन्हीं संघर्षों की बदौलत आप आगे चलकर कामयाबी की एक नयी इबारत लिख पाते हैं।

मैं आपको ज्यादा दूर न ले जाते हुए अपने ही हालात से रूबरू कराता हूँ क्योंकि अगर एक बार मैं आपको दूर लेकर चला गया तो मैं और आप दोनों रास्ता भटक सकते हैं क्योंकि मेरी याददाश्त जरा कमजोर है और मैं लापरवाह भी खूब हूँ इसलिए मैं आपको ले जा सकता हूँ लेकिन वापस लाने की जिम्मेदारी नहीं ले सकता। सुबह 5 बजे से मेरी ज़िन्दगी शुरू होती है और रात 12 बजे ख़त्म होती है इसके बीच दिन में मैं कभी नहीं सोता वैसे ईमान से कहूँ तो कभी-कभी सो भी जाया करता हूँ लेकिन ऐसा तब होता है जब मैं खुद से बगावत कर देता हूँ। सुबह 6 बजे मुझे घर से निकल जाना होता है और फिर दोपहर 1 बजे तक घर पर वापसी होती है घर आते-आते भूख से बुरा हाल हो जाता है और आलम यह है कि अगर मुझे खाना है तो बनाना भी पड़ेगा और वो भी खुद से बनाना पड़ेगा क्योंकि जब शहर में आप अकेले रहते हैं और ज्यादा दिन तक ज़िन्दा रहना चाहते हैं तो बाहर के खाने को अलविदा कह दीजिए। खाना बनते-बनते और खाते-खाते तीन बजने को आ जाता है और जब दिन ढलने की शुरूआत हो चुकी होती है तो आप क्या खाएंगे और कैसे खाएंगे। जैसे तैसे खाना ख़त्म किया जाता है और तब तक कमर में ऐंठन होने लगती है क्योंकि शहर के आदमकद गड्ढे कमर को बुरी तरह ज़ख्मी कर देते हैं लेकिन हसरत भरी निगाहों से बिस्तर, चादर और तकिये को देखने के बाद उससे दूर रहने में ही भलाई समझी जाती है क्योंकि अगर इस वक़्त नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया तो 4-5 घंटों की छोटी सी नींद के बाद ही मेरी आँख खुलेगी और तब तक रात के 9 बज चुके होंगे और फिर मुझे रतजगा करना पड़ेगा और फिर मैं देर सुबह तक सोता रह जाऊँगा, जो मुमकिन ही नहीं है।


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लंबी थकान और नींद इन सबके बीच मुझे अपना काम करना है, पढ़ाई करनी है क्योंकि अगर मैं सो गया तो सोता ही रह जाऊँगा और फिर रूह को सुकून इस बात से भी मिलता है कि मैं दुनिया का इकलौता विद्यार्थी नहीं हूँ जो संघर्ष कर रहा हूँ संघर्ष तो भगवान राम और श्रीकृष्ण ने भी गुरूकुल में जाकर किया था आज भी हालात कहाँ बदले हैं हमें अपना घर, अपना गाँव, अपने लोग सब कुछ तो छोड़ना ही पड़ रहा है ये रीत तो मुद्दत से चली आ रही है बस फर्क इतना है कि अब जंगल में किसी फ़कीर के हुज़रे में नहीं जाना पड़ रहा बल्कि शहररूपी जंगल में जाना पड़ रहा है।

अभी मैंने आपको जो बताया है वो तो कुछ भी नहीं है एक विद्यार्थी को और किन किन चीजों से रूबरू होना पड़ता है, इस मुद्दे पर तो एक क़िताब लिखी जा सकती है और आप इसे पल भर में ही जान लेना चाहते हैं ऐसा मैं कैसे होने दे सकता हूँ फिलहाल तो मुझे मेरी क़िताबें बुला रही हैं सो मैं चलता हूँ। ज़िन्दगी ने ज़िन्दा रखा और वक़्त मिला तो इस मुद्दे पर क़िताब लिख भी दूँगा लेकिन उसके लिए आपको बीस-तीस सालों का इंतजार करना होगा। भगवान करें जल्द ही मुझे कैदखाना मिल जाय कहने का मतलब कि रोजगार देकर जल्दी से कोई मुझे कैद कर ले लेकिन फिर भी एक बात मैं साफ कर दूँ कि ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हों तक मैं विद्यार्थी ही रहना चाहता हूँ क्योंकि सीखने का दौर तो कभी भी ख़त्म नहीं होता मैं या कोई भी इंसान मुकम्मल तो कभी हो ही नहीं सकता और मजे की बात यह है कि ताउम्र विद्यार्थी बने रहने का हक़ भी मुझसे कोई नहीं छीन सकता।


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