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Showing posts from September, 2017

काश मैं कुत्ता होता

आज बिरजू रोज की अपेक्षा सुबह जल्दी उठ गया था। जल्दी जल्दी गईयों की सानी-पानी करके नित्यक्रिया से निवृत्त होकर वह कमला से बोला, "मेरा कुर्ता, धोती और गमछा संदूक में से निकाल कर रख दो। मैं बस दस मिनट में नहा कर आ रहा हूँ और हाँ सुनो कुछ कलेवा करने के लिए भी जल्दी से तैयार कर देना।" जल्दी जल्दी बाल्टी और लोटा लेकर बिरजू पास के हैंडपंप पर चल पड़ा जिसका प्रयोग सारे मुहल्ले के लोग करते थे। चूँकि आज बिरजू बहुत सुबह आ गया था इसलिए वहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी वरना रोज तो नहाने के लिए काफी इंतजार करना पड़ता था उस पर भी पीछे से लोग चिल्लाते रहते थे जिसके कारण नहाना भी सही से नहीं होता था। आज का दिन अच्छा था हैंडपंप के आस पास बस दो-तीन लोग दातुन कर रहे थे और एक-दो लोग शौचादि के पश्चात हाथ पैर धो रहे थे। बिरजू ने जल्दी जल्दी बाल्टी भरी और कुर्ता खोलकर उसकी जेब से साबुन निकाला। जब भी किसी रिश्तेदारी में या किसी विशेष कार्यक्रम में जाना होता तो वह अपने आप को खूब सँवारने की कोशिश करता। साबुन लगा-लगाकर अपने शरीर को चमकाने का प्रयास करता और अपनी फटी एड़ियों को रगड़-रगड़कर चिकना बनाने का...

माँ

माँ आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। दो तीन दिनों से तबीयत कुछ ठीक नहीं है सर्दी और खाँसी के साथ थोड़ा बुखार भी है रूममेट भी घर चला गया है ऐसे में न तो खाने का मन करता है और न ही बनाने का मन करता है बाहर का खाना तो वैसे भी खाने लायक नहीं है। वैसे चिंता की कोई बात नहीं है जरा सा मौसमी बुखार है और दवा से आराम भी है मगर तुम्हारी याद इन दिनों बहुत आती है। अगर मैं घर पर होता, मेरे पास तुम होती तो क्या होता तुम तो जरा जरा सी बात पर घबरा जाती हो। फोन से तो बात रोज ही होती है मगर मैंने तुम्हें बताया नहीं कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, ये सोचकर कि शायद तुम बहुत घबरा जाओगी अगर मैं तुम्हारे पास होता तो सारे काम छोड़कर मेरी देखभाल में लग जाती, घरेलू उपचार के साथ साथ तुरंत डॉक्टर को बुला देती। ये कहने पर कि जरा सा बुखार तो है डाँट कर मुझे चुप करा देती, सर पर तेल मालिश करती और ज्यादा वक़्त मेरे पास ही बैठकर गुजारती। क्या खाने का मन कर रहा है, क्या खाना फायदेमंद रहेगा इन सबके साथ साथ और भी छोटी से छोटी बातों का खयाल रखती।      style="display:block"      data-ad-client=...

इंतजार

तुमसे बात किये हुए न जाने कितने दिन गुजर गये। ऐसा लगता है जैसे तुमसे बात किये एक उम्र ही गुजर गयी और मेरी लाचारी तो देखो कि मैं तुमसे बात भी नहीं कर सकता पता नहीं ये दिन कब आयेगा। तुम्हारी याद में मैंने अनगिनत रातें जाग कर गुजारी है अगर इतनी रातें मैंने पढ़ते हुए गुजारी होती तो कम से कम क्लर्क तो होता ही खैर शायद किस्मत में कुछ और भी अच्छा लिखा हो। तुम भी तो कितनी पत्थर हो ना, जरा सा एक मिनट मुझसे बात कर लोगी तो पहाड़ थोड़े टूट जायेगा मगर जिद्दी भी कितनी हो तुम, मेरी फिकर करती हो, मेरे बारे में जानना चाहती हो मगर मुझे कुछ और ही दिखाती हो शायद तुम्हारा और मेरा रिश्ता दुनिया के हर रिश्ते से खूबसूरत है जिसे कोई नाम भी नहीं दिया जा सकता। सच कहता हूँ तुम्हारी कमी बहुत महसूस होती है तुम्हारे बिना मेरी दुनिया वीरान है। मैं तुम्हारा इंतजार आज भी करता हूँ और हमेशा करूँगा मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि मैं हमेशा तुम्हें उतना ही प्यार करूँगा जितना आज करता हूँ। तुम बुढ़ी हो जाओगी, तुम्हारे बाल सफेद हो जायेंगे, सब दाँत टूट गये होंगे, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी होंगी, नाती-पोते बड़े हो...

आत्मसाक्षात्कार

आज मुद्दत बाद खुद से मिलने का मेरा मन कर रहा है। दूसरों के लिए तो मैंने बहुत लिखा, बहुत कुछ लिखा मगर आरज़ू है कि आज अपने बारे में कुछ लिखूँ। आजकल जिंदगी बहुत व्यस्त हो गयी है यहाँ तक कि सुकून से बैठ कर लिखने की ना फुर्सत मिलती है और ना ही इच्छा होती है। अगर ऊपर से कोई देखे तो कहे कि मेरे पास तो समय ही समय है, मैं कहाँ व्यस्त हूँ मगर नजदीक आ कर देखने पर हकीक़त कुछ और ही है। इस छोटी सी उम्र में ही मैंने न जाने कितने सुख-दुःख देखे, अच्छे लोगों के साथ भी रहा और बुरे लोगों के साथ भी दोस्ती की। हर बुरे इंसान में भी अच्छाईयाँ छिपी होती हैं सो मैंने उनसे सिर्फ उनकी अच्छाईयाँ ही ग्रहण की चूँकि जरा संवेदनशील हूँ इसलिए समाज की गंदगी को भी मैंने करीब से देखा और महसूस किया। फिलहाल मेरे जीवन के अमूल्य क्षण रेत की तरह मेरी मुट्ठी से फिसलते जा रहे हैं मगर मैं कुछ खास कर नहीं पा रहा। अब समय आ गया है कि मैं पिताजी के कंधे से सारी जिम्मेदारियों को हटाकर उन्हें भारमुक्त करूँ और स्वयं आत्मनिर्भर बनूँ। यहाँ से कैरियर के अनेक रास्ते निकलते हैं और मैं इस उधेड़बुन में हूँ कि कौनसा रास्ता मुझे मंजिल तक जल्...