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काश मैं कुत्ता होता

आज बिरजू रोज की अपेक्षा सुबह जल्दी उठ गया था। जल्दी जल्दी गईयों की सानी-पानी करके नित्यक्रिया से निवृत्त होकर वह कमला से बोला, "मेरा कुर्ता, धोती और गमछा संदूक में से निकाल कर रख दो। मैं बस दस मिनट में नहा कर आ रहा हूँ और हाँ सुनो कुछ कलेवा करने के लिए भी जल्दी से तैयार कर देना।"

जल्दी जल्दी बाल्टी और लोटा लेकर बिरजू पास के हैंडपंप पर चल पड़ा जिसका प्रयोग सारे मुहल्ले के लोग करते थे। चूँकि आज बिरजू बहुत सुबह आ गया था इसलिए वहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी वरना रोज तो नहाने के लिए काफी इंतजार करना पड़ता था उस पर भी पीछे से लोग चिल्लाते रहते थे जिसके कारण नहाना भी सही से नहीं होता था। आज का दिन अच्छा था हैंडपंप के आस पास बस दो-तीन लोग दातुन कर रहे थे और एक-दो लोग शौचादि के पश्चात हाथ पैर धो रहे थे।

बिरजू ने जल्दी जल्दी बाल्टी भरी और कुर्ता खोलकर उसकी जेब से साबुन निकाला। जब भी किसी रिश्तेदारी में या किसी विशेष कार्यक्रम में जाना होता तो वह अपने आप को खूब सँवारने की कोशिश करता। साबुन लगा-लगाकर अपने शरीर को चमकाने का प्रयास करता और अपनी फटी एड़ियों को रगड़-रगड़कर चिकना बनाने का प्रयत्न करता। आज तो वैसे भी उसके लिए किसी रिश्तेदारी या किसी विशेष कार्यक्रम से भी खास दिन था।

भारत के किसान समय से लगभग 10-15 साल पहले ही बूढ़े दिखाई देने लगते हैं। बिरजू की उम्र तो अभी चालीस भी नहीं हुई थी मगर वो 55-60 का दिख रहा था। जवानी के दिनों में वह गोरा चिट्ठा पहलवान था दिन भर अपनी गईयों को चराना और अपने साथियों के साथ गप्पे उड़ाना और मौका मिलने पर उनसे दो दो हाथ कर लेना ही उसकी दिनचर्या थी मगर कमला के आने के बाद और माँ बाप के गुजरने के बाद सारी जिम्मेदारियाँ उसके सर पर आ गयीं और युवा पहलवान बिरजू कब वृद्ध बिरजू बन गया खुद उसे ही नहीं पता चला।

बिरजू को साबुन लगाते देख और एड़ियों को रगड़ते देखकर कलपू चाचा समझ गये कि जरूर आज बिरजू को कहीं बाहर जाना है वरना वह तो पूरे साल तक साबुन ना लगाये। मुस्कुराते हुए ठिठोली के उद्देश्य से कलपू चाचा ने बिरजू से पूछा, "क्यों बिरजू आज कहाँ की तैयारी है।" आवाज सुनते ही एड़ी रगड़ने के काम में बाधा पड़ी और बिरजू ने कलपू को यूँ देखा जैसे वह उन्हें कच्चा चबा जायेगा फिर मन ही मन वह सोचने लगा कि इनको बताना ठीक नहीं कि मैं कहाँ जा रहा हूँ नहीं तो ये पूरे गाँव में जाकर हल्ला कर देंगे। वैसे भी इनके पेट में कोई बात पचती नहीं अगर इन्होंने सबको बता दिया तो हो सकता है कि मुझसे पहले वहाँ गाँव के और लोग पहुँच जायें और फिर बात बिगड़ सकती है।

फिर कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बिरजू ने कलपू चाचा से कहा "मैं अपने कस्बे के एक मित्र के यहाँ जा रहा हूँ चाचा, आज उसके लड़के की शादी है घर पर आकर नेवता दिया था और आने के लिए बहुत अनुरोध भी किया था तो सोचा कि जरा हो आऊँ वैसे भी मैं भोज तो छोड़ता नहीं।"
"अच्छा अच्छा बेटा जरूर जाओ।" कहकर कलपू चाचा आगे बढ़ गये।

लगभग आधे घंटे तक साबुन मलने के बाद हैंडपंप पर अच्छी खासी भीड़ जमा हो गयी और ना चाहते भी बिरजू को अपनी स्नान की क्रिया संपन्न करनी पड़ी।

उसके बाद जल्दी जल्दी तेज कदमों से चलते हुए बिरजू अपने घर पहुँचा और कमला से बोला "लाओ मेरे कपड़े दो और कुछ खाने के लिए अभी बनाया कि नहीं।" कमला अंदर से कपड़े लाकर बिरजू को देते हुए बोली, "क्यों नहीं सब्जी तैयार है आप बैठिए रोटी भी बना देती हूँ चावल इसलिए नहीं बनाया कि वो हल्का होता है तो जल्दी पच जायेगा।"

कपड़ा पहनने के बाद कंधे पर गमछा रखते हुए बिरजू अंदर कमरे की ओर बढ़ा ताकि आईना देख सके। अंदर मुन्नी और सोनू पढ़ रहे थे उनके सामने भला बिरजू कैसे आईना देखता। चोरी छिपे शीशे को बाहर लाकर जब उसने अपना चेहरा उसमें देखा तो उसे अपनी जवानी याद आने लगी। अचानक कमला की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुई, "चलिए खा लीजिए देर हो रही है, खुद को निहारना अब बंद करिए। अब आपकी वो उम्र नहीं रही।" कमला की आवाज सुनते ही बिरजू झेंप गया और शीशे को रखकर रसोईघर की तरफ बढ़ते बढ़ते बोला, "अरे कैसी बात करती हो अभी मेरी उम्र ही क्या है अभी तो मैं गबरू जवान हूँ अभी तो चालीसा भी नहीं लगा।"

खाना खाकर जब बिरजू अपनी साईकिल निकालने लगा तो कमला बोली, "मैं दोपहर का खाना बाँध देती हूँ आप लेकर जाईयेगा।" बिरजू कमला को लगभग डाँटते हुए बोला, "खाना देने की क्या जरूरत है गैर के पास थोड़े जा रहा हूँ। अरे पगली वहाँ तो तरह तरह के पकवान खाने को मिलेंगे वो मुझे बिना खिलाये थोड़े आने देंगे। तुम तो व्यर्थ परेशान होती हो।" कहते हुए बिरजू साईकिल के रिंग में लगी धूल को कपड़े से साफ करने लगा।
"ठीक है फिर अब आप जाईये नहीं तो देर हो जायेगी और उनसे अपनी सारी बातें कहिएगा जरा भी हिचकिचाईयेगा मत क्या पता फिर कब मौका मिले।" कमला नसीहत देने के लहजे में बोली।
"हाँ हाँ ठीक है अब मैं चलता हूँ मुन्नी और सोनू को तैयार करके समय पर स्कूल भेज देना और गईयों का भी ध्यान रखना। उन्हें लेहन डाल देना मेरे आने में शायद शाम हो जाये।" कहकर बिरजू अपनी साईकिल पर सवार होकर शहर के लिए चल पड़ा।

गाँव से शहर लगभग 25 किमी दूर था। हर आधे घंटे पर बस मिलती थी मगर फालतू खर्च कौन करे यह सोचकर बिरजू साईकिल से ही शहर के लिए चल पड़ा।

शहर धीरे धीरे नजदीक आ रहा था। सड़क के दोनों तरफ के खेतों को देखते हुए बिरजू अपनी साईकिल चलाता जा रहा था और सोच रहा था कि शिवप्रसाद जी से क्या क्या बातें कहनी हैं।

शिवप्रसाद जी क्षेत्र के विधायक थे और साथ ही साथ मंत्री भी थे। बिरजू ने सभी बातें याद कर ली थी कि मंत्रीजी से क्या क्या बातें कहनी हैं। वो तो भला हो बिशनवा का जिसने बिरजू को कल शाम ये खबर दे दी थी कि मंत्रीजी दशहरे में दो दिन के लिए अपने जिले पर पधारे हैं वरना मंत्रीजी से मिलने का ये मौका तो हाथ से निकल ही जाता। बिशनवा मंत्रीजी के आगे पीछे घूमने वालों में से है इसलिए उसे मंत्रीजी के हर कार्यक्रम की जानकारी रहती है।

बिरजू सोच रहा था शिवप्रसाद जी कितने अच्छे हैं आज के जमाने में उनके जैसा नेता कहाँ मिलता है। मुझ जैसे एक गरीब और कमजोर किसान को भी कितना सम्मान देते हैं। अभी चुनाव में ही चार-पाँच बार आ चुके हैं यहाँ तक कि दो बार तो मेरे घर जमीन पर मेरे साथ ही बैठकर भोजन भी किये हैं। उसी समय उन्होंने भीड़ से अलग अकेले में ले जाकर मुझसे कहा भी था, "देखो बिरजू एक बार मुझे विधायक बन जाने दो फिर तुम्हारा छोटा से छोटा काम हो या बड़ा से बड़ा, कोई नहीं रूकेगा। आखिर तुम अपनी जाति के हो अब तुम्हारा खयाल नहीं करेंगे तो किसका करेंगे किसी भी काम के लिए बेहिचक मुझसे मिलना।" और अब तो शिवप्रसाद जी विधायक के साथ साथ मंत्री भी बन गये हैं। आज एक एक की खबर लूँगा पंचायत के चुनाव में मैंने ग्राम प्रधान को वोट नहीं दिया था इसलिए उसने सारे गाँव में खड़ंजा बनवाया और मेरे घर के आगे वैसे ही छोड़ दिया। मंत्रीजी से कहकर अच्छी फटकार लगवाऊँगा अभी उसे क्या पता कि मेरी पहुँच कितनी ऊपर तक है मंत्रीजी से कमला और अपने लिए पेंशन तथा सरकारी आवास के लिए भी बात करूँगा।

दरअसल बिरजू के पाँच भाई थे और वह अपने भाईयों में सबसे बड़ा था। चुनाव वगैरह में पाँचों भाई और उसके परिवार वाले बिरजू के ही कहने पर वोट देते थे अत: सभी नेताओं की नजर बिरजू पर रहती थी।

शहर प्रारंभ हो गया था और मंत्रीजी का बंगला दूर से ही दिखायी दे रहा था बाहर यमपुरी के द्वार के सदृश बड़ा सा काला गेट लगा था जिसपर तीन-चार द्वारपाल पहरा दे रहे थे। बिरजू ने गेट के पास जाकर अपनी साईकिल खड़ी की और गेट पर खड़े व्यक्तियों से बोला, "मुझे मंत्रीजी से मिलना है मुझे अंदर जाने दीजिए।" एक सरसरी निगाह से बिरजू को देखने के बाद उनमें से एक व्यक्ति कड़क आवाज में बोला, "मंत्रीजी से मिलना है वो भी इतनी सुबह सुबह? क्या काम है।"
"वो मैं उन्हें ही बताऊँगा आप मुझे जाने दीजिए मैं उनका खास आदमी हूँ।" थोड़ी बहुत मिन्नतों के बाद गार्ड मान गया और उसने बंगले के बड़े से गेट का छोटा दरवाजा खोल दिया और बिरजू अपनी साईकिल बाहर ही छोड़कर अंदर चला गया।

अंदर घुसते ही बिरजू को ऐसा लगा मानो वह इंद्र की अलकापुरी में आ चुका है। गेट से कुछ दूरी पर बंगला था और गेट से बंगले तक जाने के लिए सड़क थी और सड़क के दोनों तरफ खूबसूरत बागीचा था जिसमें छायादार और फलदार वृक्ष शोभायमान थे।

चलते चलते बिरजू बंगले के पास पहुँच गया। वहाँ दो तीन अंगरक्षक इधर उधर टहल रहे थे जबकि दो लोग बंगले के अंदर से एक कुत्तानुमा प्राणी को लेकर बाहर आ रहे थे। पास आते ही उन लोगों से बिरजू ने कहा, "मुझे मंत्रीजी से मिलना है क्या वो अंदर ही हैं।" उनमें से एक व्यक्ति ने बिरजू की तरफ देखा और उसकी हैसियत का अंदाजा लगाकर बिरजू को ठीक वैसे ही घूरने लगा जैसे नहाते समय बिरजू ने कलपू को घूरा था। फिर उग्र स्वर में बोला, "इतनी सुबह सुबह पता नहीं कहाँ से आ जाते हैं देहाती गँवार। तुम निकम्मे हो तो क्या पूरी दुनिया निकम्मी है। अभी मंत्रीजी के सोने का समय है बाद में आकर मिलना।" यह कहकर वो कुत्ते को लिये आगे बढ़ गये और बिरजू वहीं बगीचे में एक पेड़ के नीचे बैठ गया और सोचने लगा कैसे कैसे आदमियों को रखा है शिवप्रसाद जी ने। इन्हें तो बोलने की जरा भी तमीज नहीं है मौका मिलने पर इनकी भी शिकायत उनसे जरूर करूँगा।
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बैठे बैठे बिरजू का ध्यान उन दोनों व्यक्तियों की तरफ गया तो उसने देखा कि दोनों व्यक्तियों ने कुत्ते को बगीचे में एक पेड़ के नीचे ले जाकर एक सोफे पर बिठा दिया और खुद नीचे बैठ गये। बिरजू को देखने से ऐसा प्रतीत होता था कि यह कुर्सी/सोफा विशेष रूप से उस कुत्ते के लिए ही बनाया गया है।

बिरजू सोचने लगा अब मेरा चालीसा लगने वाला है। बहुत देश घूमा है कई बड़े शहरों में गया हूँ पर ऐसा कुत्ता तो मैंने आज तक नहीं देखा यह तो शायद मेरी कमर से थोड़ा ही छोटा होगा। फिर बिरजू वहीं बैठे बैठे उनके एक एक क्रियाकलाप को ध्यान से देखने लगा।

दोनों व्यक्ति पहले कुत्ते को पुचकारने और सहलाने लगे उसके बाद उनमें से एक व्यक्ति ने ब्रश जैसी कोई वस्तु निकाली और उसे कुत्ते के पूरे शरीर पर रगड़ने लगा। तब तक दूसरा व्यक्ति अंदर अंदर गया और खाने की कोई वस्तु लाया और उसे ले जाकर कुत्ते को खिलाने लगा। वह वस्तु क्या थी यह बिरजू को समझ में नहीं आ रहा था। दिखने में वह वस्तु हड्डीनुमा थी और वह कुत्ता उसे चबा रहा था। जब बिरजू से नहीं रहा गया तो आखिर में उसने उनके पास जाकर पूछ ही लिया, " भाई साहब, ये आप लोग कुत्ते को क्या खिला रहे हैं।" बस इतना सुनना था कि वह तीनों प्राणी बिरजू को खा जाने वाली नजरों से घूरने लगे। उनमें से एक व्यक्ति एक एक शब्द को चबाते हुए बोला, "तुमने जैकी को कुत्ता कहा वो तो अच्छा हुआ कि मंत्रीजी नहीं हैं अगर उन्होंने सुन लिया होता तो तुम्हारी खैर नहीं थी वो जैकी को अपने बेटे की तरह रखते हैं। चुपचाप जाओ यहाँ से जाकर अपना काम देखो।"

मायूस होकर बिरजू अपने स्थान पर जाकर पुन: बैठ गया और सोचने लगा कि कुत्ते को कुत्ता कहा तो क्या गलती कर दी। ये लोग भी अजीब हैं जरा सी बात पर इतना सुना दिया मैं ही मूर्ख हूँ जो उठकर उन लोगों के पास गया था।

उसके बाद ना चाहते हुए भी बिरजू की नजरें बार बार उस कुत्ते पर ही चली जाती थी। कुत्ते को वह खाद्य पदार्थ खिलाने के बाद बकायदे साबुन और शैम्पू के साथ बहुत देर तक नहलाया गया फिर उसके शरीर से पानी सूखाने के बाद फिर से उसे कुछ खिलाया जा रहा था।

बिरजू को समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या चल रहा है एक कुत्ते की इतनी खातिरदारी की जा रही है। काश मैं इसका एक चौथाई सुख भी अपने बच्चों को दे पाता इतनी सुख सुविधा तो ना कभी मुझे मिली है और ना ही कभी मैं अपने बच्चों को दे पाया हूँ। यह कुत्ता बहुत भाग्यशाली है जो शिवप्रसाद जी ने इसे पाल लिया जरूर इसने पूर्व जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे।

बिरजू गहन सोच में था थोड़ी देर तक वह कुत्ते को देखता और फिर सोच में डूब जाता शायद उसे कुत्ते के सुख से ईर्ष्या हो रही थी। यही सब सोचते सोचते 10 बज गये बिरजू को आये भी अब दो घंटे हो रहे थे। कुत्ता भी आराम से अपनी कुर्सी पर बैठा था अब तक लगभग 20 लोग और मंत्रीजी से मिलने के लिए आ गये थे। बंगले के बाहर घूमने वाले सिपाही भी अब मुस्तैद हो गये थे शायद मंत्रीजी के आने का समय हो रहा था। लगभग 15 मिनट बाद एक आदमी बाहर आया और कहने लगा मंत्रीजी अब अपने कार्यालय में आ गये हैं मगर आज वो बहुत व्यस्त हैं। वो बस दो दिन के लिए आये हैं उन्हें अपने पूरे क्षेत्र का दौरा भी करना है इसलिए जो लोग बहुत जरूरी काम लेकर आयें हो सिर्फ वही मंत्रीजी से मिल सकते हैं।

बिरजू जरूरी काम का अर्थ नहीं समझ पाया वह भी उस व्यक्ति के पास गया और बोला, "मुझे मंत्रीजी से मिलना है मैं उनका बहुत खास आदमी हूँ मुझे अंदर जाने दीजिए।" वह व्यक्ति जो शायद मंत्री जी का सेक्रेटरी था, बोला, "अपना काम बताओ और कहाँ से आये हो ये भी बताओ।"
"जी मेरा नाम बिरजू है, मैं माधोपुर गाँव से आया हूँ और मुझे उनसे बहुत जरूरी काम है।" बिरजू बोला
"नहीं नहीं तुम कल आना आज मंत्रीजी बहुत व्यस्त हैं आज वो नहीं मिल सकते।" सेक्रेटरी ने दो टूक कहा।

बिरजू एकदम निराश हो गया कितनी भी विनती करने पर सेक्रेटरी उसे मंत्रीजी से मिलाने के लिए तैयार नहीं था। शायद वह सिर्फ उन्हीं लोगों को अंदर जाने दे रहा था जिनको या तो वह व्यक्तिगत तौर पर जानता था या फिर इससे पहले उन्हें मंत्रीजी के साथ देख चुका था। बिरजू बाहर इस आस में वैसे ही बैठा रहा ताकि मंत्रीजी कभी बाहर निकलें और उसे देखकर अपने पास बुला लें।

लगभग दो घंटे बाद मंत्रीजी बाहर निकले और उन्होंने जैकी को बुलाया। जैकी तुरंत उनके पास चला गया बिरजू दौड़ते हुए मंत्रीजी के पास गया मगर उसे देखकर उन्होंने नजरें दूसरी तरफ घूमा ली और बागीचे के उस कोने में जाकर बैठ गये जहाँ कुछ कुर्सियाँ रखी थीं। उनके साथ उनका सेक्रेटरी, जैकी, कुछ सुरक्षाकर्मी और कुछ आगंतुक भी थे। बिरजू भी पीछे पीछे वहाँ गया और बोला, "साहब मैं बिरजू हूँ। आपने पहचाना नहीं मैं माधोपुर का बिरजू। हम लोग तो कई बार मिल चुके हैं।" मगर मंत्रीजी चाय पीने में व्यस्त थे ऐसा लग रहा था कि उन्हें कुछ सुनायी ही नहीं दे रहा था। इससे पहले कि मंत्रीजी का पारा चढ़ता सेक्रेटरी ने सुरक्षाकर्मियों को इशारा किया और जबरदस्ती वो लोग बिरजू को वहाँ से हटाने लगे। बिरजू समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ ये सब क्या हो रहा है। मंत्रीजी भला उसे कैसे भूल सकते हैं उन्होंने तो खुद उसे अपने पास आने को कहा था कई बार उसके यहाँ भोजन किया था तो क्या वो सब एक झूठ था।

बिरजू अब वापस जाने को मुड़ गया वो सोच रहा था कि कितनी आशाओं के साथ वह यहाँ आया था और यहाँ क्या हो गया अब वह कमला से क्या कहेगा। तभी अचानक उसकी नजर अपने गाँव के प्रधान पर पड़ी जो मंत्रीजी से मिलने के लिए तेजी से उनकी तरफ बढ़ रहा था। बिरजू सोच रहा था इसे भी मंत्रीजी भगा ही देंगे मगर ये क्या उसे तो मंत्रीजी ने बुलाकर अपने बगल में ही बैठा लिया।

अब वहाँ बिरजू का दम घुट रहा था। सारी कहानी उसकी समझ में आ गयी थी कि कैसे उसे चुनाव में मूर्ख बनाया गया और गरीब किसान होने के कारण मंत्रीजी ने उससे बात भी नहीं की। तभी अनायास ही बिरजू की नजर जैकी पर गयी बिरजू को ऐसा लगा कि जैकी उस पर हँस रहा है और चिढ़ाते हुए कह रहा है, "देख ले मैं कुत्ता हूँ मगर तुझ से लाख गुना बेहतरी में रहता हूँ। मँहगी गाड़ियों में सफर करता हूँ और तुझसे अच्छा खाना खाता हूँ तेरे पास है ही क्या।"

बिरजू की आँखें भर आयीं और वह वापस बाहर जाने के लिए मुड़ गया। मगर रह रहकर वह सिर्फ एक बात की कल्पना कर रहा था, "काश मैं कुत्ता होता।"


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