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ब्रह्मेश्वर मुखिया : एक अनकही दास्ताँ

ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ बरमेसर मुखिया बिहार या यूँ कहें भारतवर्ष के किसान नेताओं की सूची में सर्वोपरि नाम है। श्री बरमेसर मुखिया बिहार के भोजपुर जिले के खोपिरा गाँव के निवासी थे। 90 के दशक में बिहार में नक्सलियों का आतंक बहुत बढ़ गया था। लगभग पाँच हजार बीघा जमीन नक्सलियों के कारण परती पड़ी रहती थी। क्रूर नक्सली, मजदूरों और किसानों को बलपूर्वक खेतों में काम करने से रोक देते थे इसके अलावा किसानों की फसलें भी लूट ली जाती थीं और उन्हें आग के हवाले कर दिया जाता था तथा नक्सली किसानों के शादी-विवाह जैसे समारोहों में भी बाधा डालते थे।

जब नक्सलियों का आतंक चरम पर पहुँच गया तब जमींदारों ने मातृभूमि की रक्षा करने के लिए बरमेसर मुखिया के नेतृत्व में भोजपुर के ही बेलउर गाँव में सितम्बर 1994 में एकजुट होकर रणबीर सेना नामक संगठन का का निर्माण किया।

रणबीर सेना का मुख्य उद्देश्य नक्सलियों का खात्मा करना था। रणबीर सेना के लोगों ने गाँव-गाँव जाकर किसानों को नक्सलियों के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने के लिए प्रेरित किया। इस कार्य में मुखिया जी के प्रमुख सहयोगी प्रो. देवेन्द्र सिंह, मुखिया अवधेश कुमार सिंह, कांग्रेसी नेता जनार्दन राय, कांग्रेसी नेता डा. कमलाकांत शर्मा, वकील चौधरी, भोला सिंह, युगेश्वर सिंह आदि रहे।

मुखिया जी के बारे में एक रोचक जानकारी मिलती है कि वो चाणक्य नीति से बहुत प्रभावित थे। वह रणबीर सेना के हर सैनिक को इसका पाठ पढ़ाते थे। नक्सली संगठनों और रणबीर सेना के बीच लगभग 30 मुठभेड़ हुई जिनमें बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे प्रमुख हैं। 1 दिसम्बर, 1997 को जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बाथे गाँव में लड़ी गयी लड़ाई में रणबीर सेना के सिपाहियों ने बड़ी ही वीरता दिखायी तथा नक्सलियों को मुँहतोड़ जवाब दिया। इस घटना में बरमेसर मुखिया को मुख्य अभियुक्त माना गया और 29 अगस्त, 2002 को पटना के एक्सीबिजन रोड से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मुखिया जी की गिरफ्तारी के बाद रणबीर सेना कमजोर पड़ती गयी और चूँकि प्रदेश सरकार ने भी इसको प्रतिबंधित कर दिया था अत: कुशल नेतृत्व के अभाव में इस बलवान संगठन का अस्तित्व लगभग समाप्त सा हो गया। जिन नक्सलियों को सरकार और पुलिस प्रशासन बीसियों साल की जद्दोजहद के बाद भी नियंत्रित नहीं कर सकी थी, मुखिया जी के नेतृत्व में रणबीर सेना के रणबाँकुरों ने उन नक्सलियों को चार साल के ही अंदर मृतप्राय कर दिया।


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लगभग नौ साल तक कारागार में रहने के बाद 8 जुलाई, 2011 को बरमेसर मुखिया रिहा हुए। जेल से छूटने के बाद मुखिया जी का हिंसा से मोहभंग हो गया और उन्होंने अहिंसा का मार्ग अपना लिया। अब उनका प्रमुख उद्देश्य था किसानों और मजदूरों को एकजुट करना। मुखिया जी कहते थे कि अब हमें हथियारों की जरूरत नहीं, अब नक्सलियों और किसानों ने एक दूसरे को समझ लिया है और अब बिना हथियार के किसानों के हक की लड़ाई लड़नी है। इसी क्रम में मुखिया जी ने 5 मई, 2012 को अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से संस्था बनायी। एक समय ऐसा भी आया जब इस संगठन को चलाने के लिए मुखिया जी के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया था। 13 मई को पटना के नौबतपुर से इसका अभियान शुरू हुआ जिसके बाद भोजपुर के एकवारी, बक्सर और गया के टेकारी में इसकी सभाओं का आयोजन किया गया।

माना जाता था कि मुखिया जी ऐसे ही हमेशा किसानों के हक की लड़ाई लड़ते रहेंगे मगर कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। 1 जून, 2012 शुक्रवार को भोजपुर में 66 वर्ष की आयु में ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया की धोखे से हत्या उस समय कर दी गयी जब वह सुबह 7 बजे टहलने के लिए निकले थे। इसके साथ ही वो तूफान शांत हो गया जिसकी गरज से नक्सलियों की रूह काँप जाया करती थी। पूरा कृषक किसान समाज मुखिया जी की हत्या से मृत जैसा हो गया और बिहार दंगों की आग में जल पड़ा लेकिन आज उनकी हत्या के 6 साल बाद भी उनके कातिल नहीं पकड़े जा सके शायद देश और प्रदेश में बैठे हुक्मरान नहीं चाहते होंगे कि उनके कातिलों को सजा मिले। मुखिया जी की छठीं पुण्यतिथि पर उन्हें नमन और भावभानी श्रद्धांजलि। उनकी जगह रिक्त है और उम्मीद भी नहीं कि इस स्थान को कभी कोई भर पायेगा।


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