पिछले दिनों मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से खबर आयी थी कि एक किसान जिनका नाम मूलचंद था, उनकी मौत हो गयी है। हमारा देश बहुत बड़ा है यहाँ लाखों लोग हर रोज मरते होंगे तो सवाल ये है कि इस किसान की मौत में नया क्या है। किसान एक ऐसा प्राणी है जो खुद भूखा रहकर देश का पेट भरता है लेकिन समाज में सबसे उपेक्षित भी वही किसान है इसमें कोई दो राय नहीं है। आजकल के लोग बहुत व्यस्त हो गये हैं उनके पास तो किसी बड़ी हस्ती की मौत पर सोचने का समय नहीं तो एक तुच्छ किसान के बारे में सोचने का समय उनके पास कहाँ होगा।
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दरअसल पूरी घटना ये थी कि मूलचंद, जिनकी उम्र 65 साल थी, अपना चना बेचने के लिए सरकारी क्रय-विक्रय केंद्र पर गये थे। चार दिन तक लाइन में खड़ा होकर उन्होंने तुलाई के लिए अपनी बारी आने का इंतजार किया लेकिन उनका नंबर नहीं आया। पाँचवे दिन दोपहर में भयंकर धूप और कमजोरी के कारण वो चक्कर खाकर गिर पड़े और मौके पर ही उनकी मौत हो गयी। लोगों का कहना था कि मूलचंद चार दिन से वहीं रात गुजार रहे थे गरीबी के कारण वो कुछ खरीदकर खा नहीं पा रहे थे इसलिए भूख और प्यास की वजह से उनकी मौत हो गयी। इसके बाद कई घंटों तक पुलिस घटनास्थल पर नहीं पहुँच पायी बाद में एसपी के निर्देश के बाद पुलिस पहुँची और शव को हिरासत में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। इसके बाद क्या होगा सबको पता होना चाहिए। पोस्टमार्टम का कोरम पूरा किया जायेगा, शव को उनके परिजनों को सौंप दिया जायेगा। चूँकि मरने वाला व्यक्ति किसान की प्रजाति से आता है इसलिए उम्मीद कम है कि उसे मुआवजा मिलेगा। जिस समय ये घटना घटित हुई उस समय कर्नाटक में नाटकीय राजनीति चल रही थी इसलिए बेचारी मीडिया भी इस न्यूज को कवर नहीं कर सकी।
जरा मरने वाले किसान की हालत देखिए शहरी लोगों के लिए तो वह एक घृणित व्यक्ति है लेकिन वह किसान भी किसी का बाप, किसी का पति, किसी का बेटा रहा ही होगा। इस दुर्घटना के बाद किसान का बेटा बार-बार कह रहा था कि अगर पता होता कि ये सब हो जायेगा तो वह कभी अपनी फसल बेचने के लिए यहाँ नहीं आते।
दरअसल ये सिर्फ मध्य प्रदेश के विदिशा या महाराष्ट्र के विदर्भ की कहानी नहीं है पूरे देश के किसान जैसे-तैसे अपना पेट काटकर अपनी ज़िन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं। चुनाव आते ही वादों के झुनझुने थमाकर किसानों से वोट ले लिया जाता है और उसके बाद किसानों को भुला दिया जाता है। केंद्र और प्रदेश में चाहे किसी की भी सरकार हो किसान का जीवन मुफ़लिसी में ही गुजरता है। इसके लिए कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं, कोई एक सरकार जिम्मेदार नहीं और कोई एक राजनीतिक पार्टी जिम्मेदार नहीं है। जरा सोचिए यही हाल रहा तो 50 साल बाद कौन व्यक्ति खेती करना चाहेगा। टीवी, रेडियो या अख़बार में प्रचार करने से किसानों के कभी अच्छे दिन नहीं आयेंगे अच्छे दिन लाने के लिए किसानों की जमीनी हालत से रूबरू होकर नीतियाँ बनानी पड़ेंगी और ईमानदारी से उनका क्रियान्वयन करना पड़ेगा।
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जरा मरने वाले किसान की हालत देखिए शहरी लोगों के लिए तो वह एक घृणित व्यक्ति है लेकिन वह किसान भी किसी का बाप, किसी का पति, किसी का बेटा रहा ही होगा। इस दुर्घटना के बाद किसान का बेटा बार-बार कह रहा था कि अगर पता होता कि ये सब हो जायेगा तो वह कभी अपनी फसल बेचने के लिए यहाँ नहीं आते।
दरअसल ये सिर्फ मध्य प्रदेश के विदिशा या महाराष्ट्र के विदर्भ की कहानी नहीं है पूरे देश के किसान जैसे-तैसे अपना पेट काटकर अपनी ज़िन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं। चुनाव आते ही वादों के झुनझुने थमाकर किसानों से वोट ले लिया जाता है और उसके बाद किसानों को भुला दिया जाता है। केंद्र और प्रदेश में चाहे किसी की भी सरकार हो किसान का जीवन मुफ़लिसी में ही गुजरता है। इसके लिए कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं, कोई एक सरकार जिम्मेदार नहीं और कोई एक राजनीतिक पार्टी जिम्मेदार नहीं है। जरा सोचिए यही हाल रहा तो 50 साल बाद कौन व्यक्ति खेती करना चाहेगा। टीवी, रेडियो या अख़बार में प्रचार करने से किसानों के कभी अच्छे दिन नहीं आयेंगे अच्छे दिन लाने के लिए किसानों की जमीनी हालत से रूबरू होकर नीतियाँ बनानी पड़ेंगी और ईमानदारी से उनका क्रियान्वयन करना पड़ेगा।

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