और जब रात के 3 बज रहे होते हैं, जब मैं अपने कमरे में बिल्कुल अकेला होता हूँ, जब किताबों से मन ऊब जाता है, जब गली में और गली के हर घर में सन्नाटा होता है, जब सारे श़हर के साथ तुम भी गहरी नींद में सो रही होती हो और जब मुझे बिल्कुल भी नींद नहीं आती तब अनायास ही तुम्हारी याद आती है और दिल बेचैन सा हो जाता है। चेहरे पर झूठी हँसी के साथ और चंद लोगों के साथ तो सारा दिन गुजार देता हूँ लेकिन शाम के बाद रात आते-आते तुम और तुम्हारी याद मुझ पर भारी पड़ जाती हैं और मैं रोज टूट जाता हूँ, रोज हार जाता हूँ।
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सच कहूँ तो अब आदत पड़ चुकी है। ज्यादा तड़प, ज्यादा दर्द अब नहीं होता लेकिन कभी कभी बेचैनी ज्यादा बढ़ जाती है तो तुमसे बात करने का, तुम्हें देखने का मन करता है और सच कहूँ तो बहुत मन करता है कभी कभी सोचता हूँ कि तुम्हें देख लूँ, तुमसे मिल लूँ, तुमसे बात कर लूँ लेकिन किस रिश्ते से, किस हक़ से ये भी नहीं समझ पाता। देखा जाय तो तुम्हें गये एक अरसा हुआ शायद तुम मुझे भूल गयी हो तो मैं तुम्हें क्यों नहीं भूल पा रहा? ये बेचैनी, ये तड़प, ये ग़म इन सबका वारिस, इन सबका हक़दार मैं अकेला ही क्यों, आखिर मैं अकेला ही क्यों? तुम जब मेरी नहीं रही तो भी मैं तुम्हारा ही क्यों? क्या अंजाम होगा इस बेचैनी का, इस तड़प का, क्या सारी हसरतें अधूरी रह जायेंगी, क्या हम कभी मिल नहीं पायेंगे, क्या मेरी ज़िन्दगी यूँ ही गुजर जायेगी, ऐसे कई ख़याल जेहन में आते हैं जिनका जवाब मैं नहीं जानता लेकिन खुद पर भरोसा करता हूँ कि इस कहानी का अंजाम ये तो कतई नहीं हो सकता मैं आज तुमसे बहुत दूर सही लेकिन कल को तुम्हारे पास जरूर आऊँगा भले ही एक अच्छे दोस्त की हैसियत से ही सही और इससे ज्यादा मैं कुछ चाहता भी नहीं।
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