अक्सर रातों को मुझे नींद नहीं आती, अक्सर यूँ ही मैं गुमसुम हो जाता हूँ, अक्सर बैठे-बैठे अचानक किसी के खयालों में खो जाता हूँ, अक्सर अकेले में फूट-फूटकर रो पड़ता हूँ, अक्सर गंगा-यमुना के किनारों पर बैठकर उसकी लहरों को खुद के अंदर महसूस करता हूँ क्योंकि ठीक वैसी ही लहरें मेरे अंदर भी शोर मचा रही हैं, अक्सर ये दुनिया वीरान सी लगती है, अक्सर मैं व्यथित हो जाता हूँ कभी खुद को देखकर, कभी गंगा के गोद में बसे मेरे उस छोटे से गाँव को देखकर तो कभी उस शहर को देखकर, जिसमें फुटपाथ पर सोये लोगों को रात के अंधेरों में गाड़ियों से कुचल दिया जाता है और फिर अक्सर रातों को मुझे नींद नहीं आती!
शायद जो मैं हूँ, वो मैं हूँ ही नहीं और शायद जो मैं हूँ वो कोई देख नहीं सकता, कोई समझ नहीं सकता क्योंकि शायद एक हद के बाद मैंने खुद के करीब किसी को आने ही नहीं दिया यहाँ तक कि खुद को भी नहीं क्योंकि मेरे दिल के दरवाजों पर एक बड़ा सा काला ताला लगा है और जिसकी चाबी शायद मैंने कहीं खो दी है उस चाबी को मैं रोज़ ढूंढता हूँ लेकिन वो मुझे कहीं नहीं मिलती क्योंकि शायद किसी शख़्स ने चुराकर उसे अपने पास रख लिया है और शायद वो शख़्स चाहता ही नहीं कि वो बड़ा सा काला ताला कभी खुल पाये शायद उस ताले की एक दूसरी चाबी भी होगी जिसे मैंने घर के किसी ताखे में संभाल कर रखा होगा शायद कोई चाबी किसी दिन मिल जाय और अरसो से बंद पड़ा वो ताला खुल जाय लेकिन अगर चाबी न भी मिले तो क्या फर्क पड़ता है शायद कुछ नहीं क्योंकि शहर में ताले तोड़ने वालों की कोई कमी नहीं!
शायद मैं कुछ नहीं हूँ, बस हूँ तो एक अंधकार जिसका अंत आज तक किसी को नहीं मिला इस अंधकार में जो भी आता है वो भी अंधकार ही बनकर रह जाता है या शायद मैं समंदर हूँ, जो अपनी गहराई में असंख्य राज समेटे बह रहा है, जो रास्ते में आने वाली हर चीज को खुद में मिला लेता है या फिर शायद मैं शून्य हूँ जो होने को तो कुछ भी नहीं होता लेकिन शायद सारी गणित इसके इर्द-गिर्द घूमती है शायद शून्य की अहमियत को कोई नहीं समझता या शायद समझने की काबिलियत नहीं रखता लेकिन सैकड़ों सालों में एक बार किसी का जन्म होता है, जो सिद्ध कर देता है कि ये पूरी सृष्टि शून्य पर ही आधारित है और फिर वही, कि शायद जो मैं हूँ, वो मैं हूँ ही नहीं और शायद जो मैं हूँ वो कोई देख नहीं सकता, कोई समझ नहीं सकता!
शायद जो मैं हूँ, वो मैं हूँ ही नहीं और शायद जो मैं हूँ वो कोई देख नहीं सकता, कोई समझ नहीं सकता क्योंकि शायद एक हद के बाद मैंने खुद के करीब किसी को आने ही नहीं दिया यहाँ तक कि खुद को भी नहीं क्योंकि मेरे दिल के दरवाजों पर एक बड़ा सा काला ताला लगा है और जिसकी चाबी शायद मैंने कहीं खो दी है उस चाबी को मैं रोज़ ढूंढता हूँ लेकिन वो मुझे कहीं नहीं मिलती क्योंकि शायद किसी शख़्स ने चुराकर उसे अपने पास रख लिया है और शायद वो शख़्स चाहता ही नहीं कि वो बड़ा सा काला ताला कभी खुल पाये शायद उस ताले की एक दूसरी चाबी भी होगी जिसे मैंने घर के किसी ताखे में संभाल कर रखा होगा शायद कोई चाबी किसी दिन मिल जाय और अरसो से बंद पड़ा वो ताला खुल जाय लेकिन अगर चाबी न भी मिले तो क्या फर्क पड़ता है शायद कुछ नहीं क्योंकि शहर में ताले तोड़ने वालों की कोई कमी नहीं!
शायद मैं कुछ नहीं हूँ, बस हूँ तो एक अंधकार जिसका अंत आज तक किसी को नहीं मिला इस अंधकार में जो भी आता है वो भी अंधकार ही बनकर रह जाता है या शायद मैं समंदर हूँ, जो अपनी गहराई में असंख्य राज समेटे बह रहा है, जो रास्ते में आने वाली हर चीज को खुद में मिला लेता है या फिर शायद मैं शून्य हूँ जो होने को तो कुछ भी नहीं होता लेकिन शायद सारी गणित इसके इर्द-गिर्द घूमती है शायद शून्य की अहमियत को कोई नहीं समझता या शायद समझने की काबिलियत नहीं रखता लेकिन सैकड़ों सालों में एक बार किसी का जन्म होता है, जो सिद्ध कर देता है कि ये पूरी सृष्टि शून्य पर ही आधारित है और फिर वही, कि शायद जो मैं हूँ, वो मैं हूँ ही नहीं और शायद जो मैं हूँ वो कोई देख नहीं सकता, कोई समझ नहीं सकता!

Comments
Post a Comment