तीसरे सप्तक के कवियों में से एक, नयी कविता युग के श्रेष्ठ कवि और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित केदारनाथ सिंह नहीं रहे। उनका जाना साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। केदारनाथ सिंह का जन्म 1 जुलाई, 1934 को बलिया के चकिया गाँव में हुआ था। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. व पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
लीक से हटकर लिखने वाले, थोड़े शब्दों में ज्यादा कहने वाले, प्रकृति-प्रेमी और अपनी कविताओं में गाँव को जीवित रखने वाले केदारनाथ सिंह की कविताओं ने हिंदी को एक अलग गरिमा प्रदान की है। उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि उन्होंने कविता की भाषा सरल बनायी और उसे आम लोगों तक पहुँचाया। साहित्य की दुनिया में सफलता के शिखर तक पहुँचने वाले केदारनाथ सिंह की जीवन-शैली और रहन-सहन बेहद साधारण था। वो खुद को देहाती मानते थे और खुद को देहाती दिखाना ही पसंद करते थे। उनकी कविताओं से जीवन का कोई भी पहलू बचा नहीं है उन्होंने जीवन के हर पहलू का स्पर्श अपनी कविताओं में किया है।
केदारनाथ सिंह को नम आँखों से श्रद्धांजलि, क्योंकि 'जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है'-
"मैं जा रही हूँ – उसने कहा
जाओ – मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि जाना
हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है!"
'बनारस', उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता, में वो लिखते हैं-
"तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज रोज एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ!
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है!"
केदारनाथ सिंह के जाने से हिंदी साहित्य में जिस शून्य का उद्भव हुआ है, उसे कभी कोई नहीं भर सकता। कविता में रूचि रखने वाले और हम जैसे प्रत्येक नौसिखयों के वो आदर्श थे। वास्तव में हिंदी साहित्य अब खाली हो चुका है। कुछ एक को छोड़कर वृद्ध और अनुभवी कवियों में से कोई भी अब हमारे बीच मौजूद नहीं है केदारनाथ सिंह के साथ ही साहित्य की एक पूरी पीढ़ी का खात्मा हो गया।
मगर अपनी सैकड़ों कविताओं की मदद से केदारनाथ सिंह हमारे बीच हमेशा जीवित रहेंगे और हमें प्रेरित करते रहेंगे-
"'जाऊंगा कहाँ, रहूंगा यहीं
किसी किवाड़ पर
हाथ के निशान की तरह
पड़ा रहूंगा
किसी पुराने ताखे
या संदूक की गंध में
छिपा रहूंगा मैं
दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में
अपने स्थायी पते के
अक्षरों के नीचे
या बन सका
तो ऊंची ढलानों पर
नमक ढोते खच्चरों की
घंटी बन जाऊंगा
या फिर मांझी के पुल की
कोई कील
जाऊँगा कहाँ
देखना
रहेगा सब जस का तस
सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी
सांझ को जब लौटेंगे पक्षी
लौट आऊंगा मैं भी
सुबह जब उड़ेंगे
उड़ जाऊंगा उनके संग...!"


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