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मेरी ट्रेन यात्रा

ये जीवन एक यात्रा है और हम सब एक यात्री हैं। इस संसार में किसी की यात्रा हँसते हुए गुजर जाती है तो किसी की यात्रा रोते हुए गुजरती है, किसी की यात्रा में छाँव ही छाँव होती है तो किसी को अपनी पूरी यात्रा धूप में ही तय करनी पड़ती है, किसी की यात्रा में कोई साथी मिल जाता है तो वहीं कोई अपनी यात्रा अकेले पूरी करता है लेकिन जैसे भी हो इस यात्रा को सबको पूरा करना पड़ता है और संसार का हर यात्री इस यात्रा को पूरा करता भी है।

खैर मैं दार्शनिक नहीं हूँ अत: मैं सीधे मुद्दे पर ही आ जाता हूँ। मुझे घर से जब भी इलाहाबाद के लिए जाना होता है तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने कह दिया हो कि जलती रेत पर नंगे पैर पाँच कोस पैदल चलो, गर्मी की तपती दोपहरी में गेहूँ काटो, जाड़े के दिन में गंगाजी को तैरकर पार करो या फिर निहत्थे जाकर शेर का शिकार कर लाओ और मैं कयामत से एक और दिन बचने के लिए कोई न कोई बहाना खोजने लग जाता हूँ। चूँकि मैं सबका लाडला हूँ अत: घर के सभी लोग भी मुझे रोकने के लिए किसी न किसी बहाने की तलाश करने लगते हैं लेकिन कयामत किसी के रोके आखिर कितने दिन रूकेगी रफ़्ता-रफ़्ता कयामत का दिन भी आ ही जाता है। एक तो अपने करियर की चिंता, माँ के आँखों के आँसू, बहन का प्यार, पापा का दुलार, गाँव के वो खेत, वो बगीचे, वो मंदिर, वो लोग सबको छोड़कर यात्रा पर जाना होता है ऊपर से ये चिंता भी अलग रहती है कि मेरी ये यात्रा कैसे गुजरेगी।

यात्रा छोटी ही सही, लेकिन यात्रा की चिंता यात्री को हमेशा रहती है। बूझे मन से टिकट काउंटर पर टिकट लेने के बाद ट्रेन का इंतजार होता है। 15159-सारनाथ एक्सप्रेस ज्यादातर समय पर या समय से बस आधा घंटा, जो कि भारतीय रेल के लिए सामान्य बात है, देरी से आने की संभावना रहती है। कालान्तर में ये ट्रेन सारनाथ से चलती थी लेकिन भला हो उन महान आत्मा का, जिन्होंने रेल मंत्री बनते ही इस ट्रेन को छपरा खींच लिया। हमारे यहाँ से इलाहाबाद के लिए कोई बस नहीं जाती अत: सारनाथ एक्सप्रेस ही एकमात्र सहारा होती है रात में दो और ट्रेन हैं लेकिन उनकी हालत बहुत ज्यादा खराब है।

अब असली दास्तान तो यहीं से शुरू होती है। ये ट्रेन बलिया से पहले ही ओवरलोड हो जाती है युसूफपुर तक आते-आते जनरल बोगी के दरवाजों पर यात्री बड़ी बेरहमी से झूल गये होते हैं बस मेरे लिए यही कयामत होती है और इसी वजह से मैं अपनी यात्रा को टालता रहता हूँ। स्लीपर का हाल भी बड़ा बुरा होता है बनारस तक स्लीपर में भी जनरल वाले यात्रियों की भरमार होती है उसमें भी बहुत ही मुश्किल से बैठने के लिए जगह मिलती है और ऊपर से टीटी का डर भी सताता रहता है। अब पढ़ने-लिखने वाला बेरोजगार आदमी एसी और स्लीपर का टिकट तो नहीं करा सकता लेकिन यात्रा तो कैसे भी करके पूरी करनी ही होती है।


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स्लीपर में बहुत भीड़ होती है तो कभी इलाहाबाद तक टीटी नहीं आते लेकिन कभी दो-दो बार झेलना पड़ता है और जेब ढीली करनी पड़ती है तो वहीं कभी चकमा देने में भी कामयाब हो जाते हैं ये सब अपनी किस्मत पर निर्भर करता है। वैसे भी जनरल का टिकट होता ही है तो ज्यादा की चपत नहीं लगा सकते। शुरू शुरू में थोड़ी हिचकिचाहट होती लेकिन भला हो मेरे उन तमाम दोस्तों का, जो मेरे साथ इलाहाबाद या बनारस जा रहे थे और उन्होंने मेरी ये हिचकिचाहट खत्म की। उन दिनों कई दोस्तों के मुँह से कई प्रकार के बयान सुनने को मिलते थे-
पहला दोस्त, "कुछ नहीं होता यार मैं हमेशा ऐसे ही जाता हूँ।"
दूसरा, "टीटी आता है तो डिब्बा बदल देते हैं या बाथरूम चले जाते हैं।"
तीसरा, "कह देते हैं कि स्टाफ हैं।"
चौथा, "धीरे से कोने में ले जाकर दस-बीस थमा देते हैं, मान जाते हैं।"
पाँचवा, "कह देते हैं कि अगले स्टेशन पर बदल देंगे।"
.............!!!!

तमाम बयानात सुनने के बाद मैं भी इस नतीजे पर पहुँचा कि ये कोई गलत काम नहीं है विद्यार्थी को देश में कुछ छूट भी तो मिलनी चाहिए। धक्के खाने से बेहतर है कि स्लीपर में यात्रा करो ज्यादा से ज्यादा फाइन ही लगेगी तो देकर टिकट बनवा लेंगे और फिर मेरी यात्रा ऐसे ही चलती रही।

एक दफ़ा जब मैं स्टेशन पर पहुँचा तो शायद घर से मोदीजी का भाषण सुनकर गया था जिससे मन में देशभक्ति की भावना हिलोरे मार रही थीं अत: मैंने आनन-फानन में एक कठोर निर्णय लिया कि चाहे कुछ भी हो, आज जनरल बोगी में ही यात्रा करूँगा। मुझे ग्लानि महसूस हो रही थी कि मैं अब तक जनरल के टिकट पर स्लीपर में यात्रा करके भारतीय रेल को धोखा दे रहा था। खैर ट्रेन आयी और सनी पाजी ने जैसे गदर फिल्म में पाकिस्तान में जाकर चिल्लाया था ठीक उसी प्रकार मैं दरवाजे के पास जाकर चिल्लाया ताकि लोग थोड़ी सी जगह दें और मैं चढ़ सकूँ लेकिन ये तो न सनिमा था और न मैं सनी देओल था। कैसे भी हो हल्ला करके थोड़ी सी जगह बनी और मैं बस थोड़ा सा अंदर जा सका चूँकि ट्रेन बहुत कम रूकती है तो सब कुछ बहुत जल्दी में करना भी होता है। मैं दरवाजे से बस एक दो हाथ अंदर जा पाया था और दरवाजे की तरफ ही मुँह करके खड़ा था अब मेरे पास दो बैग थे एक को मैंने कंधे पर लटकाया था और दूसरे को हाथों में लटकाया था। अब कभी मेरे पीछे वाले यात्री जगह बनाने के लिए हमें धक्का देते तो कभी मेरे आगे वाले लोग पीछे धक्का देते चूँकि हाथ वाला बैग आधे आदमी का स्थान घेर रहा था या यूँ कहिए कि एक आदमी के घुटनों तक का स्थान घेर रहा था उस समय तो एक पाव की भी कीमत थी वो तो आधा ही था तो कई सम्माननीय यात्रियों ने मुझसे बड़े प्रेम से अनुरोध किया कि मैं बैग को वहाँ से हटाकर कहीं और रख दूँ। अब मैं भला उसे कहाँ लेकर जाता अब एक उपाय था कि बैग को या तो मैं अपने सर पर रखूँ या फिर पैर के नीचे रखूँ। वहाँ एक इंच हिलने की भी जगह नहीं थी बैग को ऊपर उठा कर मैं सर पर रखता, ये संभव नहीं था अत: मैंने चालाकी करते हुए बैग को अपने हाथों से जुदा कर दिया अब बैग मेरे सहयात्री के घुटनों और मेरे घुटनों के बीच हमारे पैरों पर टिका हुआ था। इधर धक्का देने का क्रम जारी था चूँकि मेरे आगे कम लोग थे और पीछे ज्यादा लोग थे तो पीछे वालों ने जोर लगाया और जोर से हमें धकेल दिया। अब इतनी जगह तो थी नहीं कि पैर आगे जाते तो शरीर का आधा हिस्सा वहीं रह गया और कमर के ऊपर का हिस्सा थोड़ा सा आगे चला गया तब तक पीछे वालों ने अपना हुनर दिखा दिया और जो हिस्सा मेरे आधे शरीर के आगे जाने से रिक्त हुआ था, उस पर अपना अधिकार जमा लिया। अब तो समीर बुरे फँसे, मैं टेढ़ा हो चुका था और सीधा भी नहीं हो सकता था। मेरे एक पैर पर मेरा बैग था और दूसरे पैर पर दूसरे यात्री का पैर था ऐसा लग रहा था कि कमर के नीचे का पूरा हिस्सा चकनाचूर हो जायेगा। अब मेरे खयालों से मोदीजी जाते रहे चूँकि मैं फिल्में बहुत देखता हूँ इसलिए अब किसी फिल्म का वो सीन याद आ गया जिसमें सलमान खान ने अपने ऊपर से दस लोगों को यूँ करके फेंक दिया था। मैंने सोचा सल्लू भाई अगर कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता जितना खाया-पीया था उसको याद करके पूरा जोर लगा दिया पर मैं सीधा नहीं हो सका। आखिर होता भी कैसे दस-पंद्रह लोगों को पीछे धकेलना एक अकेले और कमजोर आदमी के लिए कैसे संभव था। चूँकि मैं बड़ा बुद्धिमान हूँ लेकिन ये बात अलग है कि कभी-कभी ही बुद्धि आती है तो भगवान की कृपा कि उस समय दिमाग काम कर गया और मैंने अब खड़ा रहने की कोशिश करनी छोड़ दी और अपने शरीर को आगे वाले यात्री के ऊपर गिरा दिया। बेचारा बहुत भला आदमी था शायद ऐसी हालत से कभी गुजरा होगा अत: मेरा वजन उसने संभाल लिया यकीन मानिए ऐसा करने से मुझे बहुत राहत मिली। ये सब बस युसूफपुर से शहबाज़कुली यानि 8 किमी के बीच हुआ अभी गाजीपुर आने में इतना ही फासला तय करना था मेरा एक-एक पल मौत के समान गुजर रहा था। मैं मोदीजी को कोस रहा था कि ना मैंने उन्हें सुना होता, ना ही ये गड़बड़ हुई होती अब मेरी सारी देशभक्ति हवा हो गयी थी और मैं सोच रहा था कि मैं अब तक भारतीय रेल से धोखा नहीं कर रहा था ये लोग भारत की जनता को धोखा दे रहे हैं भला ऐसे आदमी कैसे यात्रा कर सकता है क्या जान देकर आदमी यात्रा करेगा। खैर मैं अपनी कुलदेवी से प्रार्थना कर रहा था कि वो मुझे सही सलामत बस गाजीपुर पहुँचा दें मैं ड्राइवर को भी शरीफ लोगों वाली गाली दे रहा था कि वो ट्रेन को चींटी की तरह क्यों चला रहा है तब तक मोबाइल की रिंगटोन बजी, "तू जो नहीं है तो कुछ भी नहीं है...!" ये सुनकर एक पल के लिए किसी का खयाल आया लेकिन फिर तुरंत हवा हो गया। बड़ी ही मुश्किल से मोबाइल को जेब से निकालकर देखा तो घर से माताजी का फोन था, हमेशा की तरह कि सीट वगैरह मिल गयी है? अब मैं कैसे बताता कि मेरी हालत उस शेर की तरह है जिसे दस जंगली सूअरों ने जख़्मी करने के इरादे से घेर रखा है। मैंने जवाब दिया, "हाँ-हाँ, आज तो ट्रेन बिल्कुल खाली है। एकदम आराम से सीट मिल गयी बस गाजीपुर पहुँचने वाला हूँ।" अपना खयाल रखने और खाना खाने की हिदायत देकर उन्होंने फोन काट दिया। मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि किस मनहूस घड़ी में मैं जनरल बोगी में यात्रा करने के लिए चढ़ गया। खैर कुछ देर बाद गाजीपुर शहर का ओवरब्रिज दिखा तो जान में जान आयी यूँ लगा कि जिंदगी अभी बाकी है। शरीर में एक नयी ऊर्जा का संचार हुआ और ट्रेन के रूकते ही चीते की तरह कूदकर मैं बाहर आ गया। जान बची तो लाखों पाये लेकिन एक काम अभी बाकी था। बाहर निकलकर मैंने अपना शरीर सीधा किया और ट्रेन को छूकर मैंने शपथ ली कि हे सारनाथ मैं जब तक जिंदा रहूँगा तुम्हारी जनरल बोगी में कभी यात्रा नहीं करूँगा भले ही इसकी कीमत मुझे कुछ भी चुकानी पड़े। मेरी जान बख़्शने के लिए तुम्हारा शुक्रिया। मुझे अब ऐसी थकान का अनुभव हो रहा था जैसे मैं अभी-अभी भारत भ्रमण करके आया हूँ। यात्रा पूरी करने के लिए महाभारत के युद्ध में घायल अभिमन्यु की तरह अब मैं स्लीपर बोगी की तरफ मंद गति से चल पड़ा।

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