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आम से खास बना पकौड़ा

पिछले कई दिनों से मैं फेसबुक, वाट्सएप, ट्वीटर आदि विभिन्न सोशल साइट्स पर पकौड़े पर बहस होते देख रहा हूँ। फेसबुक पर भक्त और अभक्त के दो गुट बन चुके हैं इस रस्साकस्सी के खेल में कभी भक्तों का पलड़ा भारी हो जा रहा है तो कभी अभक्त भक्तों पर हावी हो जा रहे हैं। खुद को बुद्धिजीवी कहने वाला हर शख़्स इस मुद्दे पर अपना विचार व्यक्त कर रहा है मैं भी पिछले कई दिनों से कभी भक्तों की तरफ से तो कभी अभक्तों की तरफ से इस खेल का आनंद ले रहा था।

देखिए राजनीति बहुत बुरी चीज है इसलिए मैं इन तमाम चीजों से खुद को दूर रखता हूँ लेकिन इस मुद्दे पर मुझे भी अपना मत रखना चाहिए, ऐसा मैं पिछले कई दिनों से सोच रहा था क्योंकि कल मैंने कहा था कि कभी कभी मेरी भी बुद्धि काम कर जाती है।

जिन्होंने अर्थशास्त्र पढ़ा है वो जानते होंगे जो मित्र नहीं जानते हैं उन्हें मैं बताना उचित समझता हूँ। सबसे पहले बेरोजगारी की परिभाषा समझिए यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य के लिए इच्छुक होता है किन्तु उस व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल पाता है तो ऐसे व्यक्ति को बेरोजगार कहते हैं और व्यक्ति की यह स्थिती बेरोजगारी कहलाती है।

बेरोजगारी को दो भागों में बाँटा गया है, चक्रीय बेरोजगारी और संरचनात्मक बेरोजगारी। चक्रीय बेरोजगारी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में पायी जाती है और इसकी प्रकृति अस्थायी होती है जबकि संरचनात्मक बेरोजगारी समाजवादी अर्थव्यवस्था में पायी जाती है और ये बेरोजगारी स्थायी होती है संरचनात्मक बेरोजगारी कभी खत्म नहीं होती। इन दोनों को परिभाषित करने पर लेख बहुत लंबा हो जायेगा अत: संक्षिप्त में बस इतना ही समझना काफी है।

मेरी बात को जरा ध्यान से समझिएगा। चूँकि भारत एक मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश है अत: यहाँ चक्रीय और संरचनात्मक दोनों बेरोजगारी पायी जाती है लेकिन संरचनात्मक बेरोजगारी की मात्रा यहाँ अत्यधिक है अर्थात देश से बेरोजगारी पूर्ण रूप से कभी खत्म नहीं हो सकती। ये बात जब मेरे जैसा एक आम आदमी जानता है तो सत्ता में बैठे लोग नहीं जानतेे होंगे? इसीलिए भाजपा की सरकार ने सत्ता में आते ही स्वरोजगार पर बल दिया और उसके लिए स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप योजना और मुद्रा योजना जैसी योजनाएँ प्रारंभ की लेकिन देश में भ्रष्टाचार की जड़े इतनी गहरी हैं कि कुछ सार्थक नहीं हो सकता। तमाम दलालों की वजह से ये चारों योजनाएँ अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच सकीं जाहिर सी बात है कि स्वरोजगार का जो लक्ष्य मोदी ने निर्धारित किया था वो लक्ष्य अधूरा रह गया फिर भी इन योजनाओं की बदौलत देश में स्वरोजगार के अवसर पैदा हुए, नये-नये उद्यमी पैदा हुए इन योजनाओं से देश को कुछ तो फायदा जरूर हुआ लेकिन सरकारी क्षेत्र की तमाम रिक्तियों को न भर पाना निश्चित रूप से मोदी सरकार की कमजोरी है। स्वरोजगार के नशे में सरकार ने ये ध्यान नहीं दिया कि सरकारी क्षेत्र के पदों को भरना चाहिए शायद सरकार आश्वस्त थी कि स्वरोजगार की बदौलत वो बेरोजगारी को खत्म कर देगी और ऐसा हो सकता था जब सरकार की चारों योजनाएँ सौ फीसदी सफल हो जातीं लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया और बेरोजगारी घटने की बजाय बढ़ गयी।

अब हम मोदी के पकौड़े वाले बयान पर आ जाते हैं जिसकी वजह से देश में घमासान मचा हुआ है। जरा याद करिए इंटरव्यू देते समय उन्होंने जी मीडिया के एंकर सुधीर चौधरी से क्या कहा था। उन्होंने कहा था, "अगर आपकी जीटीवी स्टूडियो के बाहर कोई पकौड़े बेचता है और शाम को 200 रूपया कमाकर के घर जाता है तो उस व्यक्ति को आप रोजगार मानोगे कि नहीं मानोगे अब उसको आप देखोगे तो सरकारी दफ्तर में नहीं है, आँकड़े मे नहीं है।"

इस वक्तव्य में उन्होने पकौड़े का एक छोटा और सरल उदाहरण दिया है ताकि जनता को ये बात आसानी से समझ आ सके। पकौड़े से उनका आशय स्वरोजगार से है इसके पीछे उनका उद्देश्य यह समझाना था कि भाजपा सरकार की योजनाओं से देश में स्वरोजगार के नये अवसर पैदा हुए हैं और निश्चित रूप से उनकी बात सही है लेकिन उनके वक्तव्य को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हुए विपक्ष ने लोगों को गुमराह कर दिया और फेसबुक तथा ट्वीटर पर मोदी को ट्रोल करना शुरू कर दिया। आधे से ज्यादा लोग जानकारी के अभाव में उनकी बात का गलत अर्थ समझ रहे हैं कहने वाले तो यहाँ तक कह रहे हैं कि सुधीर चौधरी भक्त है और यह इंटरव्यू फिक्स था अगर मोदी में हिम्मत है तो रवीश कुमार के सवालों के जवाब दें। ध्यान दीजिए मोदी ने इंटरव्यू में ये नहीं कहा है कि युवा पकौड़ा बेचें या ठेला लगायें इसलिए अगर आप वाकई बुद्धिजीवी हैं तो पूरी ईमानदारी से उनके वक्तव्य को सुनिए और समझिए कि उनके कहने का आशय क्या था। जो लोग किसी राजनीतिक दल से संबंध रखते हैं उनका तो विरोध करने का हक है लेकिन आम आदमी को चाहिए कि कौआ कान ले गया तो सबसे पहले कौए का पीछा न करें पहले अपना कान देख लें।


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