वो मार्च महीने का एक ख़ुशनुमा दिन था। मौसम बिल्कुल साफ था आकाश में बादल नहीं थे। सूरज साफ उगा था लेकिन माहौल न गरम था न ठंडा था। फ़िजाँ में एक अजीब सा सूनापन, एक ख़ामोशी और एक उबासी महसूस की जा सकती थी लेकिन मेरे लिए यह दिन बाकी दिनों की तुलना में बहुत खास था क्योंकि आज वो मुझसे मिलने वाली थी। क्लास में, सड़कों पर या बस में हम अक़्सर मिला करते थे लेकिन आज वो खास मेरे लिए ही आ रही थी। मैं बहुत खुश था लेकिन मैं थोड़ा डरा हुआ था, थोड़ा सहमा हुआ था। ऐसे मामलों में कैसे पेश आते हैं, क्या बोला जाता है, क्या किया जाता है इसका मुझे तनिक भी इल्म नहीं था। वो पहली लड़की थी जिससे मैं अकेले में ऐसे मिल रहा था।
हम दोनों कुछ दिनों, कुछ महीनों के लिए अपने अपने घर जा रहे थे मैं हमेशा उसे मिलने के लिए बुलाता रहता लेकिन वो मना कर देती पता नहीं क्या सोचकर आज वो मुझसे मिलने आ रही थी शायद उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था जिसका मैं अंदाजा नहीं लगा सकता था। वो बेहद गंभीर लड़की थी कम बोलना, कम हँसना और अपने काम से ही मतलब रखना उसकी आदत थी वो बिल्कुल मेरी तरह थी हम दोनों का स्वभाव एक सा था। तब मैं और भी मासूम हुआ करता था चालाकी और दुनियादारी से मेरी कभी नहीं बनी बेहद साधारण कपड़े पहनना, साधारण बाल रखना और खुद को साधारण दिखाना ही मेरी आदत हुआ करती थी बेहद सादगी और बिना किसी कपट के मैं किसी से मिलता था शायद ये आदतें उसके अंदर भी थीं। अक़्सर मैं देखता क्लास में एक-दो लड़कियों को छोड़कर वह किसी से ज्यादा बात भी नहीं करती थी। मैं उसे पूरी तरह समझ चुका था लेकिन वो मुझे कभी नहीं समझ पायी शायद आज तक वो मुझे समझ नहीं पायी। मिलने का समय तीन बजे मुकर्रर हुआ था लेकिन मैं ठीक 2:30 बजे ही चौराहे पर उसे लेने पहुँच गया ठीक तीन बजे वो आ गयी शायद मेरी तरह वो भी समय की पाबंद थी। उस समय वो बेहद ख़ूबसूरत दिख रही थी ऐसे लगा जैसे मेरे लिए आज चाँद धरती पर उतर आया हो मैं अपलक उसे देखता ही रह गया। हमारे बीच में तय हुआ था कि हम पार्क में चलेंगे लेकिन पता नहीं क्यों उसने उस समय अपना इरादा बदल लिया। उसकी रज़ा में ही मेरी रज़ा थी तो हम मंदिर की तरफ चल पड़े। मैं रास्ते में सोच रहा था कि मुझे बात क्या करनी है लेकिन उसे सामने देखकर मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। मैं उससे बहुत डरता था आज भी मैं उससे बहुत डरता हूँ। ये सोचकर कि उसे बुरा लग जायेगा, मैं चाहते हुए भी उसे निहार नहीं पा रहा था उसके डर से मैंने ये भी नहीं कहा कि तुम आज ख़ूबसूरत लग रही हो। बात की शुरूआत उसने ही की और बातों का सिलसिला चल पड़ा कुछ खास नहीं बस रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में बात करते करते मंदिर आ गया। दर्शन करने के बाद हम बाहर आये और चल पड़े। सब कुछ सामान्य चल रहा था लेकिन मैं अंदर ही अंदर कुछ घबराया सा था। वो रास्ते में कई बार मुस्कुराई थी वो गैरों के साथ गम्भीर रहती थी लेकिन अपनों के साथ वो बहुत मिलनसार थी उसकी ये आदत भी मेरी तरह ही थी शायद उसने मुझे कुछ हद तक अपना मान लिया था शायद वो अब मुझे कुछ कुछ समझ रही थी शायद कुछ समय में वो मुझे समझ भी जाती लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उसने अंत में हास्टल की तरफ मुड़ते समय जो कहा वो एक एक लफ़्ज़ आज भी मुझे याद है। उसने कहा, "इस मुलाकात का कुछ और मतलब मत निकालना ये हमारी पहली और आखिरी मुलाकात थी।" वो ऐसी कठोर बातें अक़्सर किया करती थी लेकिन हर बार मजाक समझकर मैं उसे टाल जाता था वो जानती थी कि हमारे रिश्ते का क्या अंजाम होने वाला है लेकिन मैं इससे बेख़बर था।
मैं सोचता था कि जो मेरे दिल में चल रहा है वो उसके भी दिल में चल रहा होगा लेकिन ये मेरा एक झूठा सपना था एक ऐसा सपना, जो कभी हक़ीकत की शक़्ल नहीं ले पाता। वो चली गयी मैं उसे देखता रह गया मैं डर के मारे उससे ये भी न कह सका कि हाथ मिलाकर जाओ। मन में हजारों अनिश्चितताएँ, हजारों सपने लिए मैं भी हास्टल आ गया। अगली सुबह मैं अपने घर आ गया और वो अपने घर चली गयी। उसकी कही एक एक बात सच हुई वो मुलाकात हमारी आख़िरी मुलाकात साबित हुई। वापस जब मैं श़हर आया तो वो नहीं आयी थी मैंने इंतजार किया कि वो आयेगी फिर से हम क्लास में मिलेंगे फिर से हम सड़कों पर साथ चलेंगे फिर से हम पूरे दिन चैटिंग करेंगे लेकिन वो नहीं आयी उसने कहा कि वो अब कभी नहीं आयेगी उसने कहा कि वो अब किसी और की अमानत है उसने कहा कि वो परायी हो गयी उसने कहा कि...!
मैं टूट सा गया ऐसा लगा कि एक पल में मेरी दुनिया उजड़ गयी। मैं आख़िर तक उसके आने की उम्मीद लगाये बैठा रहा लेकिन वो नहीं आयी वो पूरी तरह गैर हो चुकी थी हाँलाकि कि हमारे बीच कुछ नहीं था, यहाँ तक कि मैंने कभी उसका हाथ भी नहीं छुआ था लेकिन मेरे दिल में बहुत कुछ चल रहा था। मैं दिल को समझाता रहा लेकिन वो भी उसकी तरह जिद्दी निकला। अब वो मुझसे नहीं मिलती बात भी नहीं करती लेकिन मेरे दिल में कुछ है, कुछ ऐसा जिसे शब्दों में नहीं बयाँ किया जा सकता जिसे दिखाया नहीं जा सकता बस महसूस किया जा सकता है। वो पत्थर है लेकिन मैं उसका इंतजार करता हूँ हर अनजान नंबर से आये कॉल को उसकी कॉल समझता हूँ हर मैसेज को उसका ही मैसेज समझता हूँ लेकिन मुझे इस बात का अंदाजा है कि वो कितनी गम्भीर है। मैं जानता हूँ कि वो कभी कॉल नहीं करेगी, कभी कोई मैसेज नहीं करेगी लेकिन फिर भी मैं उसका इंतजार करता हूँ, उसके कॉल का इंतजार करता हूँ, उसके मैसेज का इंतजार करता हूँ जिस चौराहे पर एक दिन वो मुझे छोड़कर गयी थी उसी चौराहे पर उसकी बाट खोजता हूँ मैं जानता हूँ कि उसका आना नामुमकिन सा है लेकिन मेरे दिल ने मेरी कभी नहीं मानी वो आज भी मेरी नहीं मानता क्योंकि वो भी उसकी तरह ही बहुत जिद्दी है। जिंदगी के किसी मोड़ पर जाकर जब मैं पीछे देखूँगा तो बस वही शख़्श है जो मुझे सबसे ज्यादा याद आयेगा बस वही...!
हम दोनों कुछ दिनों, कुछ महीनों के लिए अपने अपने घर जा रहे थे मैं हमेशा उसे मिलने के लिए बुलाता रहता लेकिन वो मना कर देती पता नहीं क्या सोचकर आज वो मुझसे मिलने आ रही थी शायद उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था जिसका मैं अंदाजा नहीं लगा सकता था। वो बेहद गंभीर लड़की थी कम बोलना, कम हँसना और अपने काम से ही मतलब रखना उसकी आदत थी वो बिल्कुल मेरी तरह थी हम दोनों का स्वभाव एक सा था। तब मैं और भी मासूम हुआ करता था चालाकी और दुनियादारी से मेरी कभी नहीं बनी बेहद साधारण कपड़े पहनना, साधारण बाल रखना और खुद को साधारण दिखाना ही मेरी आदत हुआ करती थी बेहद सादगी और बिना किसी कपट के मैं किसी से मिलता था शायद ये आदतें उसके अंदर भी थीं। अक़्सर मैं देखता क्लास में एक-दो लड़कियों को छोड़कर वह किसी से ज्यादा बात भी नहीं करती थी। मैं उसे पूरी तरह समझ चुका था लेकिन वो मुझे कभी नहीं समझ पायी शायद आज तक वो मुझे समझ नहीं पायी। मिलने का समय तीन बजे मुकर्रर हुआ था लेकिन मैं ठीक 2:30 बजे ही चौराहे पर उसे लेने पहुँच गया ठीक तीन बजे वो आ गयी शायद मेरी तरह वो भी समय की पाबंद थी। उस समय वो बेहद ख़ूबसूरत दिख रही थी ऐसे लगा जैसे मेरे लिए आज चाँद धरती पर उतर आया हो मैं अपलक उसे देखता ही रह गया। हमारे बीच में तय हुआ था कि हम पार्क में चलेंगे लेकिन पता नहीं क्यों उसने उस समय अपना इरादा बदल लिया। उसकी रज़ा में ही मेरी रज़ा थी तो हम मंदिर की तरफ चल पड़े। मैं रास्ते में सोच रहा था कि मुझे बात क्या करनी है लेकिन उसे सामने देखकर मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। मैं उससे बहुत डरता था आज भी मैं उससे बहुत डरता हूँ। ये सोचकर कि उसे बुरा लग जायेगा, मैं चाहते हुए भी उसे निहार नहीं पा रहा था उसके डर से मैंने ये भी नहीं कहा कि तुम आज ख़ूबसूरत लग रही हो। बात की शुरूआत उसने ही की और बातों का सिलसिला चल पड़ा कुछ खास नहीं बस रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में बात करते करते मंदिर आ गया। दर्शन करने के बाद हम बाहर आये और चल पड़े। सब कुछ सामान्य चल रहा था लेकिन मैं अंदर ही अंदर कुछ घबराया सा था। वो रास्ते में कई बार मुस्कुराई थी वो गैरों के साथ गम्भीर रहती थी लेकिन अपनों के साथ वो बहुत मिलनसार थी उसकी ये आदत भी मेरी तरह ही थी शायद उसने मुझे कुछ हद तक अपना मान लिया था शायद वो अब मुझे कुछ कुछ समझ रही थी शायद कुछ समय में वो मुझे समझ भी जाती लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उसने अंत में हास्टल की तरफ मुड़ते समय जो कहा वो एक एक लफ़्ज़ आज भी मुझे याद है। उसने कहा, "इस मुलाकात का कुछ और मतलब मत निकालना ये हमारी पहली और आखिरी मुलाकात थी।" वो ऐसी कठोर बातें अक़्सर किया करती थी लेकिन हर बार मजाक समझकर मैं उसे टाल जाता था वो जानती थी कि हमारे रिश्ते का क्या अंजाम होने वाला है लेकिन मैं इससे बेख़बर था।
मैं सोचता था कि जो मेरे दिल में चल रहा है वो उसके भी दिल में चल रहा होगा लेकिन ये मेरा एक झूठा सपना था एक ऐसा सपना, जो कभी हक़ीकत की शक़्ल नहीं ले पाता। वो चली गयी मैं उसे देखता रह गया मैं डर के मारे उससे ये भी न कह सका कि हाथ मिलाकर जाओ। मन में हजारों अनिश्चितताएँ, हजारों सपने लिए मैं भी हास्टल आ गया। अगली सुबह मैं अपने घर आ गया और वो अपने घर चली गयी। उसकी कही एक एक बात सच हुई वो मुलाकात हमारी आख़िरी मुलाकात साबित हुई। वापस जब मैं श़हर आया तो वो नहीं आयी थी मैंने इंतजार किया कि वो आयेगी फिर से हम क्लास में मिलेंगे फिर से हम सड़कों पर साथ चलेंगे फिर से हम पूरे दिन चैटिंग करेंगे लेकिन वो नहीं आयी उसने कहा कि वो अब कभी नहीं आयेगी उसने कहा कि वो अब किसी और की अमानत है उसने कहा कि वो परायी हो गयी उसने कहा कि...!
मैं टूट सा गया ऐसा लगा कि एक पल में मेरी दुनिया उजड़ गयी। मैं आख़िर तक उसके आने की उम्मीद लगाये बैठा रहा लेकिन वो नहीं आयी वो पूरी तरह गैर हो चुकी थी हाँलाकि कि हमारे बीच कुछ नहीं था, यहाँ तक कि मैंने कभी उसका हाथ भी नहीं छुआ था लेकिन मेरे दिल में बहुत कुछ चल रहा था। मैं दिल को समझाता रहा लेकिन वो भी उसकी तरह जिद्दी निकला। अब वो मुझसे नहीं मिलती बात भी नहीं करती लेकिन मेरे दिल में कुछ है, कुछ ऐसा जिसे शब्दों में नहीं बयाँ किया जा सकता जिसे दिखाया नहीं जा सकता बस महसूस किया जा सकता है। वो पत्थर है लेकिन मैं उसका इंतजार करता हूँ हर अनजान नंबर से आये कॉल को उसकी कॉल समझता हूँ हर मैसेज को उसका ही मैसेज समझता हूँ लेकिन मुझे इस बात का अंदाजा है कि वो कितनी गम्भीर है। मैं जानता हूँ कि वो कभी कॉल नहीं करेगी, कभी कोई मैसेज नहीं करेगी लेकिन फिर भी मैं उसका इंतजार करता हूँ, उसके कॉल का इंतजार करता हूँ, उसके मैसेज का इंतजार करता हूँ जिस चौराहे पर एक दिन वो मुझे छोड़कर गयी थी उसी चौराहे पर उसकी बाट खोजता हूँ मैं जानता हूँ कि उसका आना नामुमकिन सा है लेकिन मेरे दिल ने मेरी कभी नहीं मानी वो आज भी मेरी नहीं मानता क्योंकि वो भी उसकी तरह ही बहुत जिद्दी है। जिंदगी के किसी मोड़ पर जाकर जब मैं पीछे देखूँगा तो बस वही शख़्श है जो मुझे सबसे ज्यादा याद आयेगा बस वही...!

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