भारतवर्ष अपनी पुरातन संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों के लिए विश्वप्रसिद्ध है तभी तो भारत को 'विश्वगुरू' की संज्ञा दी गयी है लेकिन आज की नयी पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ में अपने संस्कारों, अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता को तेजी से रौंदती जा रही है। एक ओर जहाँ विश्व के अन्य देश भारत की संस्कृति को अपना रहे हैं तो वहीं हम भारतवासी अपनी संस्कृति को भूलकर उन्हीं देशों की संस्कृति को तेजी से अपनाते जा रहे हैं। आधुनिकता की ऐसी हवा चली है कि इस हवा में नयी पीढ़ी के लिए सभ्यता और संस्कृति का बिल्कुल लोप हो चुका है और उनके पास इस विषय में बात करने के लिए भी समय नहीं है जो कि सुखद संकेत नहीं है।
आज की नयी पीढ़ी अब पूजा-पाठ पर ध्यान नहीं देती, वर्ण-व्यवस्था को नहीं मानती, अपने माता-पिता, गुरूजनों और बुजूर्गों का आदर नहीं करती, कम उम्र में ही नशा(सिगरेट, शराब, गुटखा) कर देती है। ऐसे तमाम लक्षण हैं जिसे देखते हुए इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि वर्तमान युग में नौजवानों के लिए सभ्यता और संस्कार बिल्कुल गौड़ चीजें हैं। हम इसकी तह में जायें और इसका विश्लेषण करें कि आखिर ऐसा क्यो हो रहा है तो इसके पीछे कई कारण देखने को मिलेंगे।
कहा जाता है कि बच्चे की पहली गुरू उसकी माँ होती है वस्तुत: एक किशोर या अवयस्क या उससे कम उम्र का बच्चा वही सीखेगा जो उसे उसके माता-पिता सीखायेंगे। बच्चों का दिल कोमल होता है जैसे कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते समय अपने इच्छानुसार उन्हें आकृति दे देता है ठीक उसी प्रकार बच्चे भी जिस माहौल में रहते हैं उसी माहौल में ढल जाते हैं। यदि बचपन में आप उसे दादा-दादी या फिर बुजूर्गों का आदर करना, उन्हें नमस्कार करना नहीं सीखायेंगे तो फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो बच्चा बाद में आपका आदर करेगा? आज के युग में नौजवानों के अंदर से संस्कारों के लोप होने का सबसे बड़े कारण उन्हीं के अभिभावकगण हैं। चूँकि बच्चा ही बाद में देश का भविष्य होगा अत: अपनी संस्कृति को जीवंत रखने के लिए अति आवश्यक है कि आप बच्चों के अंदर संस्कार कूट-कूटकर भरें, उन्हें बड़ों का आदर करना सीखायें, उन्हें महापुरूषों की जीवनियाँ और ज्ञानप्रद कहानियाँ सुनायें ताकि वही महापुरूष बच्चों के आदर्श बनें।
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इसका दूसरा और एक बड़ा कारण इंटरनेट और टीवी(खासकर टीवी पर प्रसारित होने वाली फिल्में) हैं। इंटरनेट पर अच्छी से अच्छी और बुरी से बुरी चीजें मौजूद हैं अत: अभिभावकों को बच्चों को जितना हो सके स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटाप और कंप्यूटर से दूर रखना चाहिए कम से कम 18+ होने पर ही बच्चों को उनके लिए व्यक्तिगत मोबाइल देने चाहिए। दूसरी बात कि आज कल प्रसारित की जाने वाली फिल्मों ने वातावरण को प्रदूषित कर रखा है जिस अश्लीलता से फिल्मों में अंगप्रदर्शन किया जा रहा है वह अत्यन्त गंदी मानसिकता का परिचायक है। अगर बच्चा फिल्म देखेगा तो वो सब चीजें उसके हृदय पर गहरा छाप छोड़ेंगी साथ ही वह फिल्म के उसी हीरो को अपना आदर्श मानेगा जो धर्म का मजाक उड़ाता है, नशा करता है, मारकाट करता है और ऊलजलूल हरकतें करता है। अत: बच्चों को टीवी के पास कम बैठने दें और बैठाये तो उसे ज्ञानवर्धक चीजें ही दिखाएँ।
सिर्फ यही नहीं इस समस्या के अनगिनत कारण है और इस स्थिती का जिम्मेदार सिर्फ एक आदमी नहीं वरन पूरा समाज ही है। अत: दूसरों को उपदेश देने की बजाय हमें खुद में भी सुधार लाना चाहिए और अपनी पुरातन संस्कृति, जिसके लिए भारतवर्ष को विश्वगुरू की संज्ञा दी गयी है, को बढ़-चढ़कर अपनाना चाहिए और उसे जीवंत बनाने में अपना योगदान देना चाहिए। जो आज बच्चा है वो कल नौजवान होगा और जो आज नौजवान है वो भी कल वृद्ध होगा तो जरा सोचिए कि हम अपने और अपने बच्चों के भविष्य को कहाँ ले कर जा रहे हैं।
आज की नयी पीढ़ी अब पूजा-पाठ पर ध्यान नहीं देती, वर्ण-व्यवस्था को नहीं मानती, अपने माता-पिता, गुरूजनों और बुजूर्गों का आदर नहीं करती, कम उम्र में ही नशा(सिगरेट, शराब, गुटखा) कर देती है। ऐसे तमाम लक्षण हैं जिसे देखते हुए इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि वर्तमान युग में नौजवानों के लिए सभ्यता और संस्कार बिल्कुल गौड़ चीजें हैं। हम इसकी तह में जायें और इसका विश्लेषण करें कि आखिर ऐसा क्यो हो रहा है तो इसके पीछे कई कारण देखने को मिलेंगे।
कहा जाता है कि बच्चे की पहली गुरू उसकी माँ होती है वस्तुत: एक किशोर या अवयस्क या उससे कम उम्र का बच्चा वही सीखेगा जो उसे उसके माता-पिता सीखायेंगे। बच्चों का दिल कोमल होता है जैसे कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते समय अपने इच्छानुसार उन्हें आकृति दे देता है ठीक उसी प्रकार बच्चे भी जिस माहौल में रहते हैं उसी माहौल में ढल जाते हैं। यदि बचपन में आप उसे दादा-दादी या फिर बुजूर्गों का आदर करना, उन्हें नमस्कार करना नहीं सीखायेंगे तो फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो बच्चा बाद में आपका आदर करेगा? आज के युग में नौजवानों के अंदर से संस्कारों के लोप होने का सबसे बड़े कारण उन्हीं के अभिभावकगण हैं। चूँकि बच्चा ही बाद में देश का भविष्य होगा अत: अपनी संस्कृति को जीवंत रखने के लिए अति आवश्यक है कि आप बच्चों के अंदर संस्कार कूट-कूटकर भरें, उन्हें बड़ों का आदर करना सीखायें, उन्हें महापुरूषों की जीवनियाँ और ज्ञानप्रद कहानियाँ सुनायें ताकि वही महापुरूष बच्चों के आदर्श बनें।
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सिर्फ यही नहीं इस समस्या के अनगिनत कारण है और इस स्थिती का जिम्मेदार सिर्फ एक आदमी नहीं वरन पूरा समाज ही है। अत: दूसरों को उपदेश देने की बजाय हमें खुद में भी सुधार लाना चाहिए और अपनी पुरातन संस्कृति, जिसके लिए भारतवर्ष को विश्वगुरू की संज्ञा दी गयी है, को बढ़-चढ़कर अपनाना चाहिए और उसे जीवंत बनाने में अपना योगदान देना चाहिए। जो आज बच्चा है वो कल नौजवान होगा और जो आज नौजवान है वो भी कल वृद्ध होगा तो जरा सोचिए कि हम अपने और अपने बच्चों के भविष्य को कहाँ ले कर जा रहे हैं।
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