आज देश मे किसानों की जो स्थिती है वह किसी से छुपी नहीं है। दूसरों का पेट भरने वाला किसान आज खुद अपना पेट ही नहीं भर पा रहा। मौसम की मार, फसलों का वाजिब मूल्य न मिलना तथा बैंको और साहूकारों के दबाव के कारण किसानों की आर्थिक हालत साल दर साल खराब होती जा रही है और किसान खेती से विमुख होते जा रहे हैं।
कर्ज, गरीबी और भूखमरी के कारण आज किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। भारत में किसानों की आत्महत्या का मामला 1990 में संज्ञान में आया। अधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार इसकी शुरूआत महाराष्ट्र के विदर्भ से हुई जहाँ कपास किसानों की आत्महत्या का मामला सामने आया उसके बाद आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश और पंजाब सहित देश के कई प्रदेशों से किसानों की आत्महत्या की खबरें सामने आने लगीं। हैरत की बात यह है कि किसानों की आत्महत्या का आँकड़ा कम होने की बजाय बढ़ता ही चला गया हमारे देश में हर साल लगभग 20000 किसान अपने प्राणों का अंत कर देते हैं। ध्यान रहे कि ये आँकड़ा बढ़ भी सकता है क्योंकि राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के अनुसार साल 2009 में ही 17368 किसानों ने आत्महत्या की थी।
खेती में हो रहे लगातार नुकसान की वजह से किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है। 1991, 2001 और 2011 की जनगणना का अध्ययन करने पर ये बात साफ हो जाती है कि किसान अब खेती करना छोड़ रहे हैं। अब सवाल यह है कि किसानों की खराब होती आर्थिक हालत का जिम्मेदार कौन है और इसके मुख्य कारण क्या हैं।
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भारतीय कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। मानसून के विफल होने की वजह से पूरी कृषि पर नकारात्मक असर पड़ता है साथ ही देश के किसान आज भी परंपरागत खेती कर रहे हैं यहाँ आवश्यकता है किसानों को जागरूक करने की, उन्हें आधुनिक फसल, बीज, दवा, कीटनाशक आदि की जानकारी उपलब्ध कराने की ताकि किसान परंपरागत खेती छोड़कर आधुनिक खेती कर सकें। विगत कई सालों से किसानों को किसी भी फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है जिसके कारण आगे की खेती करने के लिए किसान बैंक और साहूकारों से कर्ज लेने के लिए मजबूर है और कर्ज ना चुका पाने की स्थिती में आत्महत्या उन्हें सरलतम उपाय प्रतीत होता है।
अगर देखा जाय तो किसान की इस हालत की पूरी तरह से जिम्मेदार अब तक की केंद्र तथा प्रदेश की सरकारें रही हैं। बड़े बड़े वादों के साथ सरकारें आती हैं और चली जाती हैं मगर किसान जहाँ था वहीं खड़ा रह जाता है। अपने राजनीतिक लाभ के लिए राजनीतिक पार्टियाँ किसानों के लिए कर्जमाफी जैसी तात्कालिक योजनाएँ चलाकर वोटबैंक मजबूत तो करती हैं मगर किसान की स्थिती को सुधारने के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना नहीं चला पातीं शायद इसलिए कि अगर किसान की स्थिती ठीक हुई तो अगले चुनाव में उनका इस्तेमाल कैसे किया जायेगा जबकि समय की माँग यह है कि कोई ठोस कृषि नीति लागू कर पूरी कृषि तकनीक में आमूलचूल परिवर्तन लाया जाय।
देश का पेट भरने वाला अन्नदाता महानगरों में मजदूरी करके पेट पालने को खेती करने की अपेक्षा ठीक समझता है। जरा सोचिए अगर किसान अन्न ही नहीं पैदा करेगा तो देश का पेट कैसे भरेगा और अगर किसान खेती से संतुष्ट ही नहीं है तो फिर खेती कैसे करेगा? इसलिए सरकार को चुनावी वादों से हटकर किसानों के बारे में गंभीर होकर सोचना होगा वरना ये भारतभूमि कुछ दशकों के बाद कृषि और कृषक विहीन हो जायेगी।
कर्ज, गरीबी और भूखमरी के कारण आज किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। भारत में किसानों की आत्महत्या का मामला 1990 में संज्ञान में आया। अधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार इसकी शुरूआत महाराष्ट्र के विदर्भ से हुई जहाँ कपास किसानों की आत्महत्या का मामला सामने आया उसके बाद आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश और पंजाब सहित देश के कई प्रदेशों से किसानों की आत्महत्या की खबरें सामने आने लगीं। हैरत की बात यह है कि किसानों की आत्महत्या का आँकड़ा कम होने की बजाय बढ़ता ही चला गया हमारे देश में हर साल लगभग 20000 किसान अपने प्राणों का अंत कर देते हैं। ध्यान रहे कि ये आँकड़ा बढ़ भी सकता है क्योंकि राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के अनुसार साल 2009 में ही 17368 किसानों ने आत्महत्या की थी।
खेती में हो रहे लगातार नुकसान की वजह से किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है। 1991, 2001 और 2011 की जनगणना का अध्ययन करने पर ये बात साफ हो जाती है कि किसान अब खेती करना छोड़ रहे हैं। अब सवाल यह है कि किसानों की खराब होती आर्थिक हालत का जिम्मेदार कौन है और इसके मुख्य कारण क्या हैं।
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अगर देखा जाय तो किसान की इस हालत की पूरी तरह से जिम्मेदार अब तक की केंद्र तथा प्रदेश की सरकारें रही हैं। बड़े बड़े वादों के साथ सरकारें आती हैं और चली जाती हैं मगर किसान जहाँ था वहीं खड़ा रह जाता है। अपने राजनीतिक लाभ के लिए राजनीतिक पार्टियाँ किसानों के लिए कर्जमाफी जैसी तात्कालिक योजनाएँ चलाकर वोटबैंक मजबूत तो करती हैं मगर किसान की स्थिती को सुधारने के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना नहीं चला पातीं शायद इसलिए कि अगर किसान की स्थिती ठीक हुई तो अगले चुनाव में उनका इस्तेमाल कैसे किया जायेगा जबकि समय की माँग यह है कि कोई ठोस कृषि नीति लागू कर पूरी कृषि तकनीक में आमूलचूल परिवर्तन लाया जाय।
देश का पेट भरने वाला अन्नदाता महानगरों में मजदूरी करके पेट पालने को खेती करने की अपेक्षा ठीक समझता है। जरा सोचिए अगर किसान अन्न ही नहीं पैदा करेगा तो देश का पेट कैसे भरेगा और अगर किसान खेती से संतुष्ट ही नहीं है तो फिर खेती कैसे करेगा? इसलिए सरकार को चुनावी वादों से हटकर किसानों के बारे में गंभीर होकर सोचना होगा वरना ये भारतभूमि कुछ दशकों के बाद कृषि और कृषक विहीन हो जायेगी।
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