माँ आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। दो तीन दिनों से तबीयत कुछ ठीक नहीं है सर्दी और खाँसी के साथ थोड़ा बुखार भी है रूममेट भी घर चला गया है ऐसे में न तो खाने का मन करता है और न ही बनाने का मन करता है बाहर का खाना तो वैसे भी खाने लायक नहीं है। वैसे चिंता की कोई बात नहीं है जरा सा मौसमी बुखार है और दवा से आराम भी है मगर तुम्हारी याद इन दिनों बहुत आती है। अगर मैं घर पर होता, मेरे पास तुम होती तो क्या होता तुम तो जरा जरा सी बात पर घबरा जाती हो। फोन से तो बात रोज ही होती है मगर मैंने तुम्हें बताया नहीं कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, ये सोचकर कि शायद तुम बहुत घबरा जाओगी अगर मैं तुम्हारे पास होता तो सारे काम छोड़कर मेरी देखभाल में लग जाती, घरेलू उपचार के साथ साथ तुरंत डॉक्टर को बुला देती। ये कहने पर कि जरा सा बुखार तो है डाँट कर मुझे चुप करा देती, सर पर तेल मालिश करती और ज्यादा वक़्त मेरे पास ही बैठकर गुजारती। क्या खाने का मन कर रहा है, क्या खाना फायदेमंद रहेगा इन सबके साथ साथ और भी छोटी से छोटी बातों का खयाल रखती।
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आज से कुछ साल पहले तक लगभग हर साल एक बार गर्मी में मुझे बुखार आ जाता था। मुझे याद है मेरा पूरा शरीर जलता रहता और तुम सारी सारी रात मेरे ही पास बैठकर गुजार देती और वैसे मैं भी तो तुम्हें खोजता रहता बीमार होते ही तुम्हें बुलाकर अपने पास बैठा लेता शायद तुम ही मेरी दवा थी। कभी झटके से नींद खुली तो सबसे पहले मैं यही देखता था कि तुम मेरे पास तो हो ना और फिर ताकत मिलती कि मेरे पास तो माँ बैठी ही है और तुम भी सारी रात कपड़ा भिगोकर सर पर रखती और उतारती रहती। क्या तुम्हें नींद नहीं आती थी या फिर मेरे सो लेने से ही तुम्हारी नींद पूरी हो जाती थी क्योंकि मेरी तो जब नींद खुलती थी मैं हमेशा तुम्हें जागते हुए ही पाता था और जब तुम बीमार पड़ती हो तो क्या मैं तुम्हारे लिए उतना कर पाता हूँ जितना तुम मेरे लिए करती हो। नहीं बिल्कुल नहीं अगर मैं तुम्हारे किये का एक चौथाई भी कर पाता तो अपने आप को धन्य समझता। जब तुमको बुखार आता है तो क्या मैं सारी रात तुम्हारे पास बैठा रह पाता हूँ। नहीं बिल्कुल नहीं शायद मैं खुदगर्ज हूँ हाँ मैं खुदगर्ज ही हूँ। तुम बहुत महान हो माँ बहुत से भी बहुत। मैं तो तुम्हारे पैरों की धूल के बराबर भी कभी नहीं था और ना ही कभी हो पाऊँगा पर तमन्ना जरूर है कि तुम्हें कभी ठेस ना पहुँचाऊँ, हमेशा तुम्हें खुश रख सकूँ ताकि मुझे कभी अफसोस ना करना पड़े कि मैंने माँ को दुःख पहुँचाया। बस यही आशीर्वाद दो माँ कि तुम्हारा बेटा कुछ बने ना बने मगर एक अच्छा बेटा जरूर बन सके। तुम्हारे लिए लिखने को तो बहुत कुछ है माँ बाकी की बातें फिर कभी जरूर लिखूँगा।
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