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आत्मसाक्षात्कार

आज मुद्दत बाद खुद से मिलने का मेरा मन कर रहा है। दूसरों के लिए तो मैंने बहुत लिखा, बहुत कुछ लिखा मगर आरज़ू है कि आज अपने बारे में कुछ लिखूँ। आजकल जिंदगी बहुत व्यस्त हो गयी है यहाँ तक कि सुकून से बैठ कर लिखने की ना फुर्सत मिलती है और ना ही इच्छा होती है। अगर ऊपर से कोई देखे तो कहे कि मेरे पास तो समय ही समय है, मैं कहाँ व्यस्त हूँ मगर नजदीक आ कर देखने पर हकीक़त कुछ और ही है।

इस छोटी सी उम्र में ही मैंने न जाने कितने सुख-दुःख देखे, अच्छे लोगों के साथ भी रहा और बुरे लोगों के साथ भी दोस्ती की। हर बुरे इंसान में भी अच्छाईयाँ छिपी होती हैं सो मैंने उनसे सिर्फ उनकी अच्छाईयाँ ही ग्रहण की चूँकि जरा संवेदनशील हूँ इसलिए समाज की गंदगी को भी मैंने करीब से देखा और महसूस किया।

फिलहाल मेरे जीवन के अमूल्य क्षण रेत की तरह मेरी मुट्ठी से फिसलते जा रहे हैं मगर मैं कुछ खास कर नहीं पा रहा। अब समय आ गया है कि मैं पिताजी के कंधे से सारी जिम्मेदारियों को हटाकर उन्हें भारमुक्त करूँ और स्वयं आत्मनिर्भर बनूँ। यहाँ से कैरियर के अनेक रास्ते निकलते हैं और मैं इस उधेड़बुन में हूँ कि कौनसा रास्ता मुझे मंजिल तक जल्दी पहुँचायेगा मगर मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं जल्द से जल्द कुछ भी शुरू करूँ भले ही वो औरों की नजर में छोटा हो ताकि मैं अपने और अपने पिताजी के सपनों को पूरा कर सकूँ।

मैंने कभी किसी से ईर्ष्या नहीं की, किसी से कभी द्वेष की भावना नहीं रखी। मेरे पिताजी ने भी कभी किसी का अनभल नहीं किया और कहा जाता है न कि बढ़े पूत पिता के धरमे तो इसीलिए नीली छतरी वाले पर मुझे पूरा भरोसा है कि एक ना एक दिन मेरे कर्मों का हिसाब जरूर होगा और उसके अनुसार मुझे फल भी जरूर मिलेगा।

कभी कभी फुर्सत के लमहों में बैठ के मैं सोचता हूँ कि आजतक मैंने क्या किया, आजतक की मेरी पूँजी क्या है, जिसको दिलोजान से चाहा मैं तो उसे भी हासिल नहीं कर पाया मैंने उसे भी खो दिया। क्या मैं एक असफल इंसान हूँ? ऐसी ही कई बातें मेरे जेहन में आती हैं। वास्तव में मैं अभी शून्य हूँ और मुझे शिखर तक जाना है मेरी मंजिल बड़ी कठिन है। मेरी पूँजी यही है कि दो चार अच्छे लोग मेरे जीवन में मेरे दोस्त हैं और मेरे पास एक अच्छा सा प्यारा सा परिवार है जहाँ सब लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं। मगर इन सबके बावजूद भी कभी कभी मैं खुद को बहुत तन्हा महसूस करता हूँ। पूरा फोन तो दोस्तों के नंबर से भरा पड़ा है चारो तरफ से दोस्त और अपने शुभचिंतकों से घिरा हूँ मगर ये शायद उस इंसान की कमी है जिसे मैंने खुद से भी ज्यादा चाहा शायद उसकी कमी कोई पूरी भी नहीं कर सकता। सच कहूँ तो मेरे जीवन में उसकी जगह कोई भी नहीं ले सकता।

फिर भी मैं हर ग़म, हर दुःख भूल कर ऐसे ही चलूँगा, मैं चलता रहूँगा। मैं कभी हार नहीं मानूँगा, मैं अनवरत् चलूँगा कुछ नया सीखने के लिए, कुछ नया करने के लिए, कुछ और अच्छे और सच्चे लोगों की तलाश में, हर दिन एक नयी ऊर्जा एक नये उत्साह और एक नयी ताजगी के साथ।


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